आदिनाथ
मिल जाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर आदिनाथ मिल जाएगा
आदिनाथ मिल जाएगा - सम्पूर्ण गीत
नीचे पूरा गीत एक ही प्रवाह में। उसके बाद भावार्थ और व्याख्या।
Lyrics
पूरा स्तवन एक निर्बाध प्रवाह में - बिना बीच में रोके।
प्रेम प्रभु का बरस रहा है पी ले अमृत प्यासे
सारे तीरथ तेरे अंदर, बाहर किसे तलाशे
कण कण में प्रभु क्षण क्षण में प्रभु
मुस्कानों में असुवन में प्रभु
मन की आँखें तूने खोली, तो ही दर्शन पाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर आदिनाथ मिल जाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर पार्श्वनाथ मिल जाएगा
नियति भेद नहीं करती, जो लेती है वो देती है
जो बोएगा वो काटेगा, ये जग कर्मो की खेती है
नियति भेद नहीं करती, जो लेती है वो देती है
जो बोएगा वो काटेगा, ये जग कर्मो की खेती है
यदि कर्म तेरे पावन हैं सभी
डूबेगी नहीं तेरी नाव कभी...
तेरी बांह पकड़ने को वो, भेस बदल के आएगा
पता नहीं किस रूप में आकर आदिनाथ मिल जाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर पार्श्वनाथ मिल जाएगा
नेकी व्यर्थ नहीं जाती, वो लेखा जोखा रखते हैं
औरों को फूल दिये जिसने उसके भी हाथ महकते हैं
नेकी व्यर्थ नहीं जाती, वो लेखा जोखा रखते हैं
औरों को फूल दिये जिसने उसके भी हाथ महकते हैं
कोई दीप मिले तो बाती बन
तू भी तो किसी का साथी बन...
मन को मानसरोवर करले, तो ही मोती पाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर आदिनाथ मिल जाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर पार्श्वनाथ मिल जाएगा
कान लगा के बातें सुनले सूखे हुए दरख्तों की
लेता है भगवान परीक्षा सबसे प्यारे भक्तों की
एक प्रश्न है गहरा जिसकी प्रभु को थाह लगानी है
तेरी श्रद्धा सोना है या बस सोने का पानी है
जो फूल धरे हर डाली पर
विश्वास तो रख उस माली पर...
तेरे भाग में पत्थर है तो पत्थर भी खिल जाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर आदिनाथ मिल जाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर पार्श्वनाथ मिल जाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर पार्श्वनाथ मिल जाएगा
भावार्थ और व्याख्या
पूरा गीत एक साथ पढ़ने के बाद उसके भाव को देखना अधिक सहज हो जाता है।
यह रचना भक्ति, कर्म, नेकी और श्रद्धा को एक ही धारा में जोड़ती है। गीत पहले आत्मा को छूता है, फिर धीरे-धीरे उसके भीतर छिपे दर्शन को खोलता है। गीत का आरंभ ही यह याद दिलाता है कि दिव्यता बाहर दौड़कर नहीं, भीतर जागकर मिलती है। “मन की आँखें” खुलना ही सम्यक् दर्शन की पहली किरण है। जीवन को कर्म की खेती कहना जैन कर्म-सिद्धांत का सबसे सहज काव्यरूप है। पावन कर्म ही नाव को संभालते हैं, और प्रभु भेस बदल कर उसी की बांह पकड़ते हैं। यह सेवा और अनुकंपा की सुंदर छवि है। दूसरों को सहारा देने वाला स्वयं भी उसी करुणा से सुगंधित होता है। कठिन समय में ही पता चलता है कि विश्वास सतही है या सच्चा। सच्ची श्रद्धा पत्थर जैसी स्थितियों में भी खिलना सिखाती है।भीतर की यात्रा
कर्म का सीधा सत्य
नेकी का सुगंधित फल
श्रद्धा की परीक्षा
आत्मदर्शन
तीर्थ भीतर खोजना इस स्तवन की पहली और मूल पुकार है।
कर्म
जग कर्मों की खेती है — हर भाव और क्रिया का महत्व है।
नेकी
दिया गया फूल पहले अपने ही हाथों को महकाता है।
श्रद्धा
सच्चा विश्वास पत्थर को भी फूल बना देता है।
कभी किसी मौन में, कभी किसी सहारे में, कभी किसी आहट में -
पता नहीं किस रूप में आकर आदिनाथ मिल जाएगा।

