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Library > शत्रुंजय स्तवन
ऋषभजी बोलावे छे एना सपना आवे छे

ऋषभजी बोलावे छे, एना सपना आवे छे
जे एना थई जावे छे, एना ए थई जावे छे.
ऋषभजी बोलावे छे ...
सपनामां एनाथी वातो थाय; आंख खूले त्यां सौ पहेला देखाय,

सात जात्रा मैशप

लागी रे लागी रे लागी -3
लागी रे लागी रे लागी-3
लागी लगनवा छोड़ी न छुटे,
ऋषभ जिनन्द दयाल हो मोरी लागी लगनवा

आदिनाथ मिल जाएगा

आदिनाथ प्रभु हर रूप में मिल जाते हैं, मौन, आहट या मुस्कान में।
जीवन कर्मों की खेती है, जो बोएगा वही काटेगा।
नेकी बाँटने वाला स्वयं भी सुगंधित होता है।
सच्चा तीर्थ बाहर नहीं, भीतर की श्रद्धा और साधना में है।

सात जात्रा मैशप

लागी रे लागी रे लागी -3
लागी रे लागी रे लागी-3
लागी लगनवा छोड़ी न छुटे,
ऋषभ जिनन्द दयाल हो मोरी लागी लगनवा

आया दिन आखा तीज का हे आदिश्वरा

आदीनाथा मेरी अरदास है
तेरे दर्शन की प्यास है हो ... तेरे दर्शन की प्यास है
तू मेरी सांसे तू मेरी धड़कन
तेरे चरणो मे मै हूं अर्पण

शत्रुंजय में सजके बैठा

चाँद सितारे फूल और खुशबू ... (2)
ये तो सारे पुराने हैं,
शत्रुंजय में सजके बैठा,
हम उसके दीवाने हैं।

ऋषभजी बोलावे छे एना सपना आवे छे

ऋषभजी बोलावे छे, एना सपना आवे छे
जे एना थई जावे छे, एना ए थई जावे छे.
ऋषभजी बोलावे छे ...
सपनामां एनाथी वातो थाय; आंख खूले त्यां सौ पहेला देखाय,

गिरिराज आदिनाथ बैठे है

गिरिराज ... आदिनाथ ...
बैठे है ... मेरे भीतर में ... (3)
तीर जाऊ में भव समंदर से,
तीर जाऊ में भव समंदर से

सिद्धाचल दरबार झाझरमान लागे छे

सिद्धाचल दरबार झाझरमान लागे छे,
राजा ऋषभ देव महरबान लागे छे।
आज अनंता सिद्धोंनो एहसान लागे छे,
शाश्वत सुखना अही सम्मान लागे छे।

श्री आदिनाथ चालीसा

शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन को, करुं प्रणाम |
उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम ||
सर्व साधु और सरस्वती जिन मन्दिर सुखकार |
आदिनाथ भगवान को मन मन्दिर में धार ||