आदिनाथ प्रभु हर रूप में मिल जाते हैं, मौन, आहट या मुस्कान में।जीवन कर्मों की खेती है, जो बोएगा वही काटेगा।नेकी बाँटने वाला स्वयं भी सुगंधित होता है।सच्चा तीर्थ बाहर नहीं, भीतर की श्रद्धा और साधना में है।