अष्टमंगल जैन धर्म के आठ शुभ प्रतीक हैं, स्वस्तिक, श्रीवृक्ष, भद्रासन, कलश, मीनयुगल, दर्पण, त्रिरत्न और नंदीपद। ये प्रतीक केवल सजावटी चिन्ह नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक अर्थ और जीवन‑मार्गदर्शन का संदेश देते हैं।
पंच महाव्रत जैन धर्म के पाँच मूल स्तंभ हैं, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। ये व्रत केवल बाहरी अनुशासन नहीं, बल्कि विचार, वाणी और कर्म की शुद्धि का मार्ग हैं। गृहस्थ इन्हें अणुव्रत के रूप में अपनाते हैं, जबकि साधु‑साध्वी कठोरता से जीवनभर निभाते हैं।