चातुर्मास 2026 – चारों सम्प्रदायों की सम्पूर्ण तिथियाँ | JainKart Library
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चातुर्मास २०२६
चारों सम्प्रदायों की सम्पूर्ण तिथियाँ

श्वेतांबर · दिगंबर · स्थानकवासी · तेरापंथी — सभी की विस्तृत जानकारी एक स्थान पर

📅 वीर निर्वाण संवत् २५५२ 🗓 विक्रम संवत् २०८२–२०८३ ✍ जैनकार्ट लाइब्रेरी

चातुर्मास — जैन धर्म का सबसे पवित्र एवं आत्म-साधना का काल है। वर्षा ऋतु के चार महीनों में जब जमीन पर असंख्य जीव-जन्तु उत्पन्न होते हैं, तब जैन साधु-साध्वियाँ एक ही स्थान पर विराजमान होकर संयम, तप और स्वाध्याय में रत रहते हैं। श्रावक-श्राविकाएँ भी इस काल में अपनी आराधना को विशेष गति देते हैं। प्रस्तुत ब्लॉग में चातुर्मास २०२६ की चारों सम्प्रदायों की सटीक तिथियाँ, उनके प्रारम्भ-समापन तथा मुख्य पर्वों की जानकारी दी गई है।

📖 चातुर्मास क्या है?

चातुर्मास (चार + मास = चार महीने) जैन परम्परा में वर्षायोग के नाम से भी जाना जाता है। यह काल आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी अथवा पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तक चलता है। इन चार महीनों में जैन मुनि-महाराज एक ही स्थान पर स्थिरवास करते हैं ताकि पृथ्वी पर उत्पन्न असंख्य सूक्ष्म जीवों की रक्षा हो सके।

इस अवधि में श्रावक समाज भी विशेष व्रत-पच्चक्खाण, देशावकाशिक व्रत, पोसह, उपवास आदि धार्मिक अनुष्ठान करता है। प्रत्येक सम्प्रदाय अपने आगम एवं परम्परा के अनुसार चातुर्मास की तिथियाँ निर्धारित करता है, इसीलिए इनमें एक-दो दिन का अंतर संभव है।

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अहिंसा का आधार: चातुर्मास का मूल उद्देश्य वर्षा ऋतु में उत्पन्न अनेक स्थावर-त्रस जीवों की रक्षा करना है। भगवान महावीर के अहिंसा-सिद्धान्त का सर्वोच्च व्यावहारिक रूप यही वर्षायोग है।

📆 वर्ष २०२६ का संक्षिप्त परिचय

⭐ वर्ष की मुख्य विशेषताएँ
  • वीर निर्वाण संवत् २५५२ · विक्रम संवत् २०८२–२०८३
  • आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी — २० जुलाई २०२६ (सोमवार) — आषाढी चौमासी चौदस
  • आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) — २१ जुलाई २०२६ (मंगलवार)
  • पर्युषण पर्व (श्वेतांबर) — ४ सितम्बर से ११ सितम्बर २०२६
  • दशलक्षण पर्व (दिगंबर) — १२ सितम्बर से २१ सितम्बर २०२६
  • कार्तिक पूर्णिमा (चातुर्मास समापन) — नवम्बर २०२६

🕉 चारों सम्प्रदायों की विस्तृत तिथियाँ

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श्वेतांबर
SHWETAMBAR
चातुर्मास प्रारम्भ २० जुलाई २०२६ आषाढ़ शु. चतुर्दशी, सोमवार
आषाढी चौमासी चौदस २० जुलाई २०२६ पाक्षिक प्रतिक्रमण
पर्युषण पर्व प्रारम्भ ४ सितम्बर २०२६ भाद्रपद शु. पञ्चमी
सम्वत्सरी (अन्तिम दिन) ११ सितम्बर २०२६ भाद्रपद शु. द्वादशी
चातुर्मास समापन नव. २०२६ कार्तिक शु. एकादशी/पूर्णिमा
कुल अवधि लगभग ४ माह ~१२० दिन
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दिगंबर
DIGAMBAR
वर्षायोग प्रारम्भ २१ जुलाई २०२६ आषाढ़ शु. पूर्णिमा, मंगलवार
आषाढी पूर्णिमा २१ जुलाई २०२६ गुरु पूर्णिमा
दशलक्षण पर्व प्रारम्भ १२ सितम्बर २०२६ भाद्रपद शु. त्रयोदशी
दशलक्षण पर्व समापन २१ सितम्बर २०२६ भाद्रपद शु. चतुर्दशी/पूर्णिमा
क्षमावाणी २१ सितम्बर २०२६ अनन्त चतुर्दशी / पूर्णिमा
चातुर्मास समापन नव. २०२६ कार्तिक शु. पूर्णिमा
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स्थानकवासी
STHANAKWASI
वर्षावास प्रारम्भ २० जुलाई २०२६ आषाढ़ शु. चतुर्दशी, सोमवार
मासिक पोसह प्रतिमाह चतुर्थी–पंचमी व अष्टमी–चौदस
पर्युषण प्रारम्भ ४ सितम्बर २०२६ भाद्रपद शु. पञ्चमी
सम्वत्सरी महापर्व ११ सितम्बर २०२६ भाद्रपद शु. द्वादशी
मिच्छामि दुक्कड़म् ११ सितम्बर २०२६ सम्वत्सरी को
वर्षावास समापन नव. २०२६ कार्तिक शु. एकादशी
तेरापंथी
TERAPANTHI
वर्षावास प्रारम्भ जुलाई २०२६ आचार्यश्री के निर्देशानुसार
केन्द्रीय वर्षावास स्थल आचार्य संघ लाडनूँ / जयपुर / सूरत आदि
पर्युषण प्रारम्भ ४ सितम्बर २०२६ भाद्रपद शु. पञ्चमी
सम्वत्सरी ११ सितम्बर २०२६ पर्युषण अन्तिम दिवस
विशेषता एकत्व वर्षावास समस्त साधु-साध्वियाँ एक स्थान
वर्षावास समापन नव. २०२६ कार्तिक शु. एकादशी

🌸 पर्युषण / दशलक्षण पर्व — २०२६ की विशेष तिथियाँ

पर्युषण जैन धर्म का सर्वश्रेष्ठ पर्व है। श्वेतांबर इसे ८ दिन और दिगंबर इसे १० दिन मनाते हैं।

श्वेतांबर पर्युषण प्रारम्भ
४ सितम्बर २०२६
भाद्रपद शु. पञ्चमी, शुक्रवार
सम्वत्सरी (श्वेतांबर / स्थानकवासी / तेरापंथी)
११ सितम्बर २०२६
पर्युषण का ८वाँ दिन — क्षमायाचना
दशलक्षण पर्व प्रारम्भ (दिगंबर)
१२ सितम्बर २०२६
भाद्रपद शु. त्रयोदशी
क्षमावाणी (दिगंबर)
२१ सितम्बर २०२६
अनन्त चतुर्दशी — क्षमा पर्व

📊 तुलनात्मक तिथि-सारणी

सम्प्रदायचातुर्मास प्रारम्भतिथिपर्युषण / दशलक्षणसम्वत्सरी / क्षमावाणीचातुर्मास समापन
श्वेतांबर२० जुलाई २०२६आषाढ़ शु. चतुर्दशी४–११ सितम्बर (८ दिन)११ सितम्बरकार्तिक शु. एकादशी
दिगंबर२१ जुलाई २०२६आषाढ़ शु. पूर्णिमा१२–२१ सितम्बर (१० दिन)२१ सितम्बरकार्तिक शु. पूर्णिमा
स्थानकवासी२० जुलाई २०२६आषाढ़ शु. चतुर्दशी४–११ सितम्बर (८ दिन)११ सितम्बरकार्तिक शु. एकादशी
तेरापंथीजुलाई २०२६आचार्यश्री निर्देशित४–११ सितम्बर (८ दिन)११ सितम्बरकार्तिक शु. एकादशी

🌙 चौमासी चौदस — २०२६

चातुर्मास के चार मासों में चार बार चौमासी चौदस (चतुर्मास चतुर्दशी) आती है। यह दिन विशेष पाक्षिक प्रतिक्रमण का दिन होता है। सभी सम्प्रदायों में इस दिन साधु-साध्वियाँ एवं श्रावक विशेष प्रतिक्रमण करते हैं।

क्र.चौमासी चौदसतिथिदिन
आषाढ़ी चौमासी चौदस२० जुलाई २०२६सोमवार
आश्विन चौमासी चौदसअक्टूबर २०२६पंचांगानुसार
पौष चौमासी चौदसजनवरी २०२७पंचांगानुसार
फाल्गुन चौमासी चौदसमार्च २०२७पंचांगानुसार

🔍 चार सम्प्रदायों में मुख्य अन्तर

श्वेतांबर एवं स्थानकवासी

ये दोनों सम्प्रदाय एक ही चन्द्र-गणना का अनुसरण करते हैं अतः इनकी तिथियाँ प्रायः समान रहती हैं। दोनों आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी से चातुर्मास प्रारम्भ करते हैं। पर्युषण में सम्वत्सरी दोनों की भाद्रपद शुक्ल द्वादशी (अथवा पंचांगानुसार) को होती है।

दिगंबर

दिगंबर सम्प्रदाय आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा से वर्षायोग प्रारम्भ करता है जो श्वेतांबर से एक दिन बाद होती है। इनका मुख्य पर्व दशलक्षण पर्व है जो श्वेतांबर पर्युषण के अगले दिन से आरम्भ होकर १० दिन तक चलता है। अन्त में क्षमावाणी (अनन्त चतुर्दशी) मनाई जाती है।

तेरापंथी

तेरापंथी सम्प्रदाय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि समस्त साधु-साध्वियाँ आचार्यश्री के साथ एकत्व स्थान पर चातुर्मास करते हैं। यह परम्परा आचार्य भिक्षु द्वारा स्थापित की गई थी। २०२६ में तेरापंथ के वर्षावास स्थल की घोषणा आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा की जाएगी।

🙏 चातुर्मास में प्रमुख अनुष्ठान

📿
श्रावक-श्राविकाओं के लिए विशेष आराधना:
चातुर्मास के इन पवित्र दिनों में पोसह व्रत, उपवास, अट्ठाई, मासखमण, अम्बिल-ओलि, नवपद ओलि, सिद्धिचक्र पूजन, अभिषेक, देशावकाशिक व्रत, एकासना, बियासना जैसे अनेक धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

चातुर्मास में मुनि महाराज श्रावक समाज को प्रवचन, सामायिक, स्वाध्याय के माध्यम से धर्म-मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। श्रावक इस काल में हरी सब्जियाँ, कन्दमूल का परित्याग करते हैं तथा रात्रि-भोजन त्यागने का संकल्प लेते हैं।

प्रत्येक पाक्षिक प्रतिक्रमण के दिन — अष्टमी, चतुर्दशी — श्रावक विशेष आराधना करते हैं। जो श्रावक संभव हो उन्हें इस काल में अपने नगर/ग्राम में ही स्थिर रहना चाहिए।

सामान्य प्रश्न (FAQ)

चातुर्मास २०२६ कब से शुरू होगा?
श्वेतांबर एवं स्थानकवासी परम्परा में २० जुलाई २०२६ (आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी) से तथा दिगंबर परम्परा में २१ जुलाई २०२६ (आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा) से चातुर्मास प्रारम्भ होगा। तेरापंथ परम्परा में आचार्यश्री के निर्देशानुसार तिथि निश्चित होती है।
पर्युषण पर्व २०२६ में कब है?
श्वेतांबर, स्थानकवासी एवं तेरापंथी परम्परा में ४ सितम्बर से ११ सितम्बर २०२६ (८ दिन) तक पर्युषण पर्व मनाया जाएगा। सम्वत्सरी ११ सितम्बर २०२६ को होगी। दिगंबर परम्परा में दशलक्षण पर्व १२ से २१ सितम्बर २०२६ तक मनाया जाएगा।
श्वेतांबर और दिगंबर के चातुर्मास में क्या अन्तर है?
श्वेतांबर आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को चातुर्मास प्रारम्भ करते हैं जबकि दिगंबर आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा (एक दिन बाद) को। मुख्य पर्व में श्वेतांबर पर्युषण (८ दिन) तथा दिगंबर दशलक्षण (१० दिन) मनाते हैं। दिगंबर की समाप्ति क्षमावाणी से होती है जो श्वेतांबर की सम्वत्सरी के बाद लगभग १० दिन बाद आती है।
चातुर्मास में साधु-साध्वियाँ एक स्थान पर क्यों रहते हैं?
वर्षा ऋतु में भूमि पर असंख्य सूक्ष्म जीव उत्पन्न होते हैं। चलते समय इन जीवों की हिंसा होने की संभावना अधिक रहती है। इसीलिए भगवान महावीर के समय से ही जैन मुनि वर्षा ऋतु में विहार नहीं करते और एक स्थान पर स्थिरवास करते हैं — यही अहिंसा धर्म का सर्वोत्कृष्ट पालन है।
तेरापंथ का वर्षावास स्थान कैसे जानें?
तेरापंथ सम्प्रदाय में आचार्यश्री महाश्रमणजी प्रतिवर्ष अपने सभी साधु-साध्वियों का वर्षावास स्थान निर्धारित करते हैं। २०२६ के स्थान की सूचना जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा की आधिकारिक वेबसाइट अथवा जेटीवी चैनल पर उपलब्ध होगी।
मिच्छामि दुक्कड़म् का अर्थ क्या है?
मिच्छामि दुक्कड़म् अर्धमागधी भाषा का वाक्य है जिसका अर्थ है — "मेरे द्वारा किए गए दुष्कृत (पाप) मिथ्या हों अर्थात् वे नष्ट हो जाएँ।" सम्वत्सरी एवं क्षमावाणी के दिन जैन धर्मावलम्बी एक-दूसरे से यह कहकर क्षमा माँगते और देते हैं।

🌸 उपसंहार

चातुर्मास — सम्पूर्ण जैन समाज के लिए आत्म-शुद्धि, संयम एवं अहिंसा का महापर्व है। चाहे श्वेतांबर हों, दिगंबर हों, स्थानकवासी हों या तेरापंथी — सभी इस काल में अपनी धार्मिक साधना को नई ऊर्जा देते हैं। तिथियों में सम्प्रदाय-भेद से एक-दो दिन का अन्तर आगम-परम्परा के कारण है, परन्तु समस्त जैन समाज का लक्ष्य एक ही है — आत्मा की शुद्धि एवं मोक्ष-मार्ग पर अग्रसर होना।

✨ जैनकार्ट लाइब्रेरी का सन्देश
  • इस चातुर्मास में अधिक से अधिक जैन साहित्य का स्वाध्याय करें।
  • अपने नगर में आए हुए मुनि-महाराजों के प्रवचन का लाभ उठाएँ।
  • प्रतिदिन सामायिक, प्रतिक्रमण और जिन-पूजन को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
  • पर्युषण में कम से कम एक दिन का उपवास अवश्य करें।
  • सम्वत्सरी के दिन सभी जीवों से मन-वचन-काया से क्षमायाचना करें।

🙏 जय जिनेन्द्र 🙏

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नोट: उपरोक्त तिथियाँ जैन पंचांग एवं प्रमुख आचार्यों के निर्देशों पर आधारित हैं। स्थानीय पंचांग के अनुसार एक-दो दिन का अन्तर संभव है। अपने सम्प्रदाय के आचार्यश्री / पंचांग से पुष्टि अवश्य करें।

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