चातुर्मास २०२६
चारों सम्प्रदायों की सम्पूर्ण तिथियाँ
श्वेतांबर · दिगंबर · स्थानकवासी · तेरापंथी — सभी की विस्तृत जानकारी एक स्थान पर
चातुर्मास — जैन धर्म का सबसे पवित्र एवं आत्म-साधना का काल है। वर्षा ऋतु के चार महीनों में जब जमीन पर असंख्य जीव-जन्तु उत्पन्न होते हैं, तब जैन साधु-साध्वियाँ एक ही स्थान पर विराजमान होकर संयम, तप और स्वाध्याय में रत रहते हैं। श्रावक-श्राविकाएँ भी इस काल में अपनी आराधना को विशेष गति देते हैं। प्रस्तुत ब्लॉग में चातुर्मास २०२६ की चारों सम्प्रदायों की सटीक तिथियाँ, उनके प्रारम्भ-समापन तथा मुख्य पर्वों की जानकारी दी गई है।
चातुर्मास क्या है?
चातुर्मास (चार + मास = चार महीने) जैन परम्परा में वर्षायोग के नाम से भी जाना जाता है। यह काल आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी अथवा पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तक चलता है। इन चार महीनों में जैन मुनि-महाराज एक ही स्थान पर स्थिरवास करते हैं ताकि पृथ्वी पर उत्पन्न असंख्य सूक्ष्म जीवों की रक्षा हो सके।
इस अवधि में श्रावक समाज भी विशेष व्रत-पच्चक्खाण, देशावकाशिक व्रत, पोसह, उपवास आदि धार्मिक अनुष्ठान करता है। प्रत्येक सम्प्रदाय अपने आगम एवं परम्परा के अनुसार चातुर्मास की तिथियाँ निर्धारित करता है, इसीलिए इनमें एक-दो दिन का अंतर संभव है।
अहिंसा का आधार: चातुर्मास का मूल उद्देश्य वर्षा ऋतु में उत्पन्न अनेक स्थावर-त्रस जीवों की रक्षा करना है। भगवान महावीर के अहिंसा-सिद्धान्त का सर्वोच्च व्यावहारिक रूप यही वर्षायोग है।
वर्ष २०२६ का संक्षिप्त परिचय
- वीर निर्वाण संवत् २५५२ · विक्रम संवत् २०८२–२०८३
- आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी — २० जुलाई २०२६ (सोमवार) — आषाढी चौमासी चौदस
- आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) — २१ जुलाई २०२६ (मंगलवार)
- पर्युषण पर्व (श्वेतांबर) — ४ सितम्बर से ११ सितम्बर २०२६
- दशलक्षण पर्व (दिगंबर) — १२ सितम्बर से २१ सितम्बर २०२६
- कार्तिक पूर्णिमा (चातुर्मास समापन) — नवम्बर २०२६
चारों सम्प्रदायों की विस्तृत तिथियाँ
🌸 पर्युषण / दशलक्षण पर्व — २०२६ की विशेष तिथियाँ
पर्युषण जैन धर्म का सर्वश्रेष्ठ पर्व है। श्वेतांबर इसे ८ दिन और दिगंबर इसे १० दिन मनाते हैं।
तुलनात्मक तिथि-सारणी
| सम्प्रदाय | चातुर्मास प्रारम्भ | तिथि | पर्युषण / दशलक्षण | सम्वत्सरी / क्षमावाणी | चातुर्मास समापन |
|---|---|---|---|---|---|
| २० जुलाई २०२६ | आषाढ़ शु. चतुर्दशी | ४–११ सितम्बर (८ दिन) | ११ सितम्बर | कार्तिक शु. एकादशी | |
| २१ जुलाई २०२६ | आषाढ़ शु. पूर्णिमा | १२–२१ सितम्बर (१० दिन) | २१ सितम्बर | कार्तिक शु. पूर्णिमा | |
| स्थानकवासी | २० जुलाई २०२६ | आषाढ़ शु. चतुर्दशी | ४–११ सितम्बर (८ दिन) | ११ सितम्बर | कार्तिक शु. एकादशी |
| तेरापंथी | जुलाई २०२६ | आचार्यश्री निर्देशित | ४–११ सितम्बर (८ दिन) | ११ सितम्बर | कार्तिक शु. एकादशी |
चौमासी चौदस — २०२६
चातुर्मास के चार मासों में चार बार चौमासी चौदस (चतुर्मास चतुर्दशी) आती है। यह दिन विशेष पाक्षिक प्रतिक्रमण का दिन होता है। सभी सम्प्रदायों में इस दिन साधु-साध्वियाँ एवं श्रावक विशेष प्रतिक्रमण करते हैं।
| क्र. | चौमासी चौदस | तिथि | दिन |
|---|---|---|---|
| १ | आषाढ़ी चौमासी चौदस | २० जुलाई २०२६ | सोमवार |
| २ | आश्विन चौमासी चौदस | अक्टूबर २०२६ | पंचांगानुसार |
| ३ | पौष चौमासी चौदस | जनवरी २०२७ | पंचांगानुसार |
| ४ | फाल्गुन चौमासी चौदस | मार्च २०२७ | पंचांगानुसार |
चार सम्प्रदायों में मुख्य अन्तर
श्वेतांबर एवं स्थानकवासी
ये दोनों सम्प्रदाय एक ही चन्द्र-गणना का अनुसरण करते हैं अतः इनकी तिथियाँ प्रायः समान रहती हैं। दोनों आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी से चातुर्मास प्रारम्भ करते हैं। पर्युषण में सम्वत्सरी दोनों की भाद्रपद शुक्ल द्वादशी (अथवा पंचांगानुसार) को होती है।
दिगंबर
दिगंबर सम्प्रदाय आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा से वर्षायोग प्रारम्भ करता है जो श्वेतांबर से एक दिन बाद होती है। इनका मुख्य पर्व दशलक्षण पर्व है जो श्वेतांबर पर्युषण के अगले दिन से आरम्भ होकर १० दिन तक चलता है। अन्त में क्षमावाणी (अनन्त चतुर्दशी) मनाई जाती है।
तेरापंथी
तेरापंथी सम्प्रदाय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि समस्त साधु-साध्वियाँ आचार्यश्री के साथ एकत्व स्थान पर चातुर्मास करते हैं। यह परम्परा आचार्य भिक्षु द्वारा स्थापित की गई थी। २०२६ में तेरापंथ के वर्षावास स्थल की घोषणा आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा की जाएगी।
चातुर्मास में प्रमुख अनुष्ठान
चातुर्मास के इन पवित्र दिनों में पोसह व्रत, उपवास, अट्ठाई, मासखमण, अम्बिल-ओलि, नवपद ओलि, सिद्धिचक्र पूजन, अभिषेक, देशावकाशिक व्रत, एकासना, बियासना जैसे अनेक धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।
चातुर्मास में मुनि महाराज श्रावक समाज को प्रवचन, सामायिक, स्वाध्याय के माध्यम से धर्म-मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। श्रावक इस काल में हरी सब्जियाँ, कन्दमूल का परित्याग करते हैं तथा रात्रि-भोजन त्यागने का संकल्प लेते हैं।
प्रत्येक पाक्षिक प्रतिक्रमण के दिन — अष्टमी, चतुर्दशी — श्रावक विशेष आराधना करते हैं। जो श्रावक संभव हो उन्हें इस काल में अपने नगर/ग्राम में ही स्थिर रहना चाहिए।
सामान्य प्रश्न (FAQ)
उपसंहार
चातुर्मास — सम्पूर्ण जैन समाज के लिए आत्म-शुद्धि, संयम एवं अहिंसा का महापर्व है। चाहे श्वेतांबर हों, दिगंबर हों, स्थानकवासी हों या तेरापंथी — सभी इस काल में अपनी धार्मिक साधना को नई ऊर्जा देते हैं। तिथियों में सम्प्रदाय-भेद से एक-दो दिन का अन्तर आगम-परम्परा के कारण है, परन्तु समस्त जैन समाज का लक्ष्य एक ही है — आत्मा की शुद्धि एवं मोक्ष-मार्ग पर अग्रसर होना।
- इस चातुर्मास में अधिक से अधिक जैन साहित्य का स्वाध्याय करें।
- अपने नगर में आए हुए मुनि-महाराजों के प्रवचन का लाभ उठाएँ।
- प्रतिदिन सामायिक, प्रतिक्रमण और जिन-पूजन को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
- पर्युषण में कम से कम एक दिन का उपवास अवश्य करें।
- सम्वत्सरी के दिन सभी जीवों से मन-वचन-काया से क्षमायाचना करें।
🙏 जय जिनेन्द्र 🙏

