
गिरनार तीर्थ
गुजरात का पावन पर्वत
१०,००० सीढ़ियाँ, १६ मंदिर, ३ कल्याणक नेमिनाथ भगवान की दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण भूमि। गिरनार केवल एक पर्वत नहीं, एक जीवंत तीर्थ है।
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गिरनार पर्वत जूनागढ़ से मात्र ५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह सौराष्ट्र का सर्वोच्च पर्वत जैन धर्म के २२वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण भूमि है। यह वही पावन स्थान है जहाँ एक युवा राजकुमार ने विवाह-मंडप से उठकर संन्यास लिया और मोक्ष प्राप्त किया।
गिरनार को प्राचीन काल में रैवत पर्वत या उज्जयंतगिरि कहा जाता था। जैन शास्त्रों में इसका उल्लेख प्रथम तीर्थंकर से लेकर अंतिम तीर्थंकर तक के काल में मिलता है। यह पर्वत तीन कल्याणकों की भूमि है दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष। इसे पालीताना (शत्रुंजय) का पाँचवाँ शिखर भी माना जाता है।
८वीं से १५वीं शताब्दी के बीच निर्मित ८६६ जैन और हिंदू तीर्थस्थल इस पर्वत पर हैं। यहाँ जैन और हिंदू दोनों परंपराएँ समान श्रद्धा से साथ-साथ विद्यमान हैं धार्मिक सहिष्णुता का अद्भुत उदाहरण।
"भगवान नेमिनाथ श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे। विवाह की तैयारी में जब उन्होंने देखा कि उनके भोज के लिए हजारों पशुओं को बंदी बनाया गया है और वे करुण क्रंदन कर रहे हैं, तो उनका हृदय विद्ध हो उठा। उन्होंने तुरंत विवाह त्याग दिया, राजमहल छोड़ा और सीधे गिरनार पर्वत की ओर चल पड़े।" उनकी होने वाली पत्नी राजुलमती ने भी उनका अनुसरण किया और साध्वी संघ की स्थापना की।
उत्तराध्ययन सूत्र, अध्याय २२ और जैन आगम-परंपरा पर आधारित"नेमिनाथ ने रैवत पर्वत पर आरोहण किया और संन्यस्त हो गए। उन्होंने सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त किया और मुक्ति पाई।"
उत्तराध्ययन सूत्र भगवान महावीर की प्रत्यक्ष वाणी में नेमिनाथ का उल्लेखइतिहास शताब्दियों की श्रद्धा
नेमिनाथ मंदिर का निर्माण ११२९ ईस्वी में सोलंकी वंश के सौराष्ट्र गवर्नर सज्जन ने करवाया था। उन्होंने सौराष्ट्र के तीन वर्षों के राजस्व का उपयोग इस मंदिर के निर्माण में किया। सोलंकी राजा जयसिंह सिद्धराज ने इसे अपने पिता के नाम पर "कर्णविहार" नाम दिया।
वास्तुपाल और तेजपाल गुजरात के प्रधानमंत्री और माउंट आबू के दिलवाड़ा मंदिर के निर्माताओं ने भी गिरनार में मंदिर और मंडप बनवाए। १२३१ ईस्वी में मल्लिनाथ मंदिर और अन्य मंदिरों का निर्माण उन्होंने करवाया। १२८८ ईस्वी के एक अभिलेख के अनुसार नेमिनाथ की पूजा के लिए प्रतिदिन ३,०५० फूलों का उपयोग किया जाता था।
आचार्य धरसेन षट्खंडागम ग्रंथ के प्रेरणास्रोत ने गिरनार की चंद्रगुफा में तपस्या की थी। उन्होंने यहीं मुनि पुष्पदंत और भूतबलि को ज्ञान प्रदान किया जिन्होंने ८६ से १५६ ईस्वी के बीच षट्खंडागम की रचना की।
पाँच टूंक आध्यात्मिक आरोहण के पाँच पड़ाव
गिरनार पर पाँच प्रमुख टूंक हैं। प्रथम टूंक तक पहुँचने के लिए ४,४०० सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। शिखर तक पहुँचने के लिए कुल १०,००० सीढ़ियाँ हैं।
काले ग्रेनाइट से बना नेमिनाथ मंदिर (११२८-११५९ ई.) यहाँ का मुख्य आकर्षण है। १३०x१९० फुट के आँगन में ६७ कक्ष और ८४ छोटे मंदिर हैं। यहाँ राजुलमती गुफा और बाहुबली की ४ फुट ऊँची प्रतिमा भी है। गोमुख कुंड से निरंतर जल प्रवाहित होता रहता है।
अंबिका देवी मंदिर यहाँ स्थित है जो ७८४ ईसा पूर्व से पहले बना था। यह अणिरुद्ध कुमार का निर्वाण स्थल है। मुनि अणिरुद्धकुमार के पदचिह्न यहाँ स्थापित हैं।
यह श्रीकृष्ण के पुत्र शांबू कुमार का निर्वाण-स्थल है। यहाँ उनके पदचिह्न स्थापित हैं। यह टूंक जैन-वैष्णव परंपराओं के सुंदर संगम का प्रतीक है।
श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न कुमार का निर्वाण-स्थल। यह टूंक सबसे कठिन चढ़ाई वाला है प्राकृतिक पत्थरों पर चढ़ना पड़ता है। यहाँ उनके पदचिह्न स्थापित हैं।
यह भगवान नेमिनाथ का निर्वाण-स्थल है सर्वोच्च शिखर। यहाँ नेमिनाथ के पदचिह्न स्थापित हैं। यहाँ पहुँचना हर जैन यात्री के जीवन का सर्वोच्च आध्यात्मिक अनुभव है।
प्रमुख मंदिर संगमरमर में उकेरा इतिहास
प्रथम टूंक पर १६ मंदिरों का एक भव्य समूह है जो एक किले जैसे परिसर में स्थित हैं। इनकी नक्काशी को अक्सर माउंट आबू के दिलवाड़ा मंदिर की नक्काशी के समकक्ष बताया जाता है।
काले ग्रेनाइट निर्मित, माड़ू-गुर्जर स्थापत्य शैली। नेमिनाथ की काले पाषाण की मूर्ति, शंख हाथ में धारण किए, पद्मासन में विराजित।
१९वें तीर्थंकर मल्लिनाथ को समर्पित। नीले रंग में मल्लिनाथ की प्रतिमा। जैन पौराणिक दृश्यों की उत्कृष्ट नक्काशी।
भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित यह मंदिर अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। परिसर में पार्श्वनाथ के जीवन के दृश्य अंकित हैं।
गिरनार के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक। वास्तुपाल-तेजपाल ने यहाँ अपनी और भाई की मूर्तियाँ स्थापित की थीं।
भगवान महावीर को समर्पित आधुनिक मंदिर जो उस स्थान पर है जहाँ उन्होंने अपना अंतिम उपदेश दिया।
वह गुफा जहाँ भगवान नेमिनाथ की होने वाली पत्नी राजुलमती ने तपस्या की और साध्वी बनीं। स्त्री-शक्ति और समर्पण का प्रतीक।


रोचक तथ्य जो आप नहीं जानते होंगे
- पर्वत-दौड़ की परंपरा: प्रत्येक वर्ष आधार से शिखर और वापस तक दौड़ आयोजित होती है। स्थानीय लोगों के अनुसार सबसे तेज समय ४२ मिनट ३६ सेकंड रहा है।
- षट्खंडागम की जन्मभूमि: आचार्य धरसेन ने गिरनार की चंद्रगुफा में तपस्या करते हुए षट्खंडागम की रचना की प्रेरणा दी दिगम्बर जैन परंपरा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ।
- कृष्ण के परिवार का निर्वाण-स्थल: श्रीकृष्ण के तीन पुत्रों प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और शांबू ने इसी पर्वत पर मोक्ष प्राप्त किया। इसीलिए यह जैन-वैष्णव दोनों के लिए पवित्र है।
- अखंड ज्योत: नेमिनाथ मंदिर में एक अखंड ज्योत अनेक वर्षों से निरंतर जल रही है इसे कभी बुझने नहीं दिया गया।
- उत्तराध्ययन सूत्र में उल्लेख: छठी शताब्दी ईसा पूर्व का जैन ग्रंथ उत्तराध्ययन सूत्र जो महावीर की प्रत्यक्ष वाणी मानी जाती है अध्याय २२ में नेमिनाथ के गिरनार पर संन्यास का उल्लेख करता है।
- अगले २० तीर्थंकर: जैन मान्यता के अनुसार भावी चौवीसी के २० तीर्थंकर भी गिरनार से ही मोक्ष प्राप्त करेंगे।
तीर्थ यात्री के लिए व्यावहारिक जानकारी
गिरनार पर चढ़ना केवल एक यात्रा नहीं यह उस युवा राजकुमार के पदचिह्नों पर चलना है जिसने अपने विवाह-मंडप से उठकर करोड़ों प्राणियों की पीड़ा सुनी और संन्यास ले लिया। जब आप १०,००० सीढ़ियाँ चढ़कर उस शिखर पर खड़े होते हैं जहाँ नेमिनाथ ने मोक्ष पाया, तो एक पल के लिए आप भी उस शाश्वत शांति को छू लेते हैं।
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स्रोत एवं संदर्भ सूची
इस लेख की सभी ऐतिहासिक, वास्तु-संबंधी और तीर्थ-संबंधी जानकारी प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित है।
छठी शताब्दी ईसा पूर्व का जैन आगम जिसमें भगवान नेमिनाथ के गिरनार पर संन्यास का प्रत्यक्ष उल्लेख है।
मंदिर की वास्तुकला, अभिलेख, ऐतिहासिक पुनर्निर्माण और वास्तुपाल-तेजपाल की भूमिका के लिए।
मंदिर-समूह, टूंक-व्यवस्था, नेमिनाथ की कथा और सोलंकी काल के निर्माण के लिए।
टूंक-वार सीढ़ियों की संख्या, धरसेन आचार्य की गुफा और षट्खंडागम के संदर्भ के लिए।
Routledge, २०००। गिरनार के श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों परंपराओं में महत्व के लिए।
पर्वत-दौड़, भावी तीर्थंकरों की मान्यता, कृष्ण-पुत्रों के निर्वाण और षट्खंडागम के संदर्भ के लिए।
जय जिनेन्द्र 🙏

