ग्वालियर किले की जैन शिल्पकला | गोपाचल पर्वत | धरोहर BY JAINKART

धरोहर BY JAINKART · Jain Heritage

ग्वालियर किले की
जैन शिल्पकला

मध्य प्रदेश के ग्वालियर किले की बलुई चट्टानों में उकेरी गई जैन तीर्थंकर प्रतिमाएँ विश्व की सबसे विशाल और सबसे विस्तृत जैन शैल-शिल्पकला का प्रतिनिधित्व करती हैं। 7वीं से 15वीं शताब्दी के बीच निर्मित ये प्रतिमाएँ टोमर राजाओं की आस्था, जैन समाज के समर्पण और बाबर के विध्वंस के बाद पुनर्जीवन की अमर गाथा सुनाती हैं।

📍 ग्वालियर, मध्य प्रदेश 🏔 गोपाचल पर्वत 🗿 7वीं से 15वीं शताब्दी 🏛 5 समूह, सैकड़ों प्रतिमाएँ 🌿 ASI संरक्षित

ग्वालियर का किला अपने भव्य इतिहास के लिए प्रसिद्ध है, पर बहुत कम लोग जानते हैं कि इस किले की चट्टानों में एक ऐसी जैन धरोहर छिपी है जो अपनी विशालता और सघनता में संसार में अतुलनीय है। पुरातत्ववेत्ता जेम्स बर्गेस ने लिखा था कि 15वीं शताब्दी में यहाँ जैन समाज ने जैसे एक अदम्य आवेग में इस पूरी पर्वत-चट्टान को महान जैन तीर्थ में परिवर्तित कर दिया।

"In the 15th century, during the reign of the Tomar Rajas, the Jains seem to have been seized with an uncontrollable impulse to convert the cliff that sustains the fort into a great shrine in honour of their religion, and in a few years excavated the most extensive series of Jaina caves known to exist anywhere."

James Burgess, पुरातत्ववेत्ता

गोपाचल पर्वत, इतिहास और पहचान

ग्वालियर किले के पुराने नाम गोपाचल या गोपगिरि से ये शिल्पकलाएँ "गोपाचल पर्वत जैन प्रतिमाएँ" या "गोपाचल रॉक-कट जैन मॉन्यूमेंट्स" के नाम से जानी जाती हैं। यह पर्वत बलुए पत्थर की चट्टानों से बना है जो 308 मीटर ऊँचा है।

इन प्रतिमाओं का निर्माण काल 7वीं से 15वीं शताब्दी तक फैला है। सबसे पुरानी प्रतिमाएँ दक्षिण-पश्चिम समूह की हैं जिन्हें पुरातत्ववेत्ता एल.बी. सिंह ने 6वीं-8वीं शताब्दी का बताया है। अधिकांश प्रतिमाएँ टोमर वंश के शासनकाल (1440-1473) में बनाई गईं।

इन प्रतिमाओं में तीर्थंकरों को पद्मासन (ध्यान मुद्रा में बैठे) और कायोत्सर्ग (खड़े, निर्मोह मुद्रा में) दोनों रूपों में दर्शाया गया है। यह जैन मूर्तिकला की सर्वाधिक विशिष्ट शैली है।

5मूर्ति-समूह
57 फुटसबसे ऊँची प्रतिमा
24तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ
7वीं सदीसबसे प्राचीन शिल्प
1527बाबर द्वारा विध्वंस

पाँच शिल्प-समूह

उर्वाही समूहSiddhachal

सबसे लोकप्रिय और विशाल समूह

उर्वाही द्वार के दोनों ओर स्थित यह समूह सर्वाधिक देखा जाता है क्योंकि मुख्य सड़क से ही ये प्रतिमाएँ दिखती हैं। यहाँ 22 विशाल प्रतिमाएँ हैं। 1440-1453 के छः शिलालेख मिले हैं। यहाँ की प्रतिमाओं के शीश बाबर ने खंडित करवाए थे जो बाद में जैन समाज ने पुनर्निर्मित करवाए।

दक्षिण-पूर्वGopachal Atishya

ek Patthar ki Bawadi, 26 गुफाएँ

इसे अब "गोपाचल अतिशय क्षेत्र" कहा जाता है। यहाँ आधे मील में फैली 26 गुफाओं की एक पंक्ति है। 1468-1473 के 13 शिलालेख इस समूह की ऐतिहासिक प्रामाणिकता देते हैं।

दक्षिण-पश्चिमTrishalagiri

सबसे प्राचीन जैन मूर्तियाँ

त्रिशालागिरि के नाम से जाना जाता यह समूह ग्वालियर की सबसे पुरानी जैन प्रतिमाएँ रखता है। पुरातत्ववेत्ता एल.बी. सिंह के अनुसार ये 6वीं से 8वीं शताब्दी की हैं, गुप्तोत्तर काल की।

उत्तर-पश्चिमNaminath Giri

बाबर के विध्वंस से बची अखंड प्रतिमा

नामीनाथ गिरि के नाम से जाना जाने वाला यह समूह दुर्गम है। 1470 का एक शिलालेख यहाँ मिला है। चूँकि बाबर के सैनिक यहाँ तक नहीं पहुँच सके, इसलिए भगवान नमिनाथ की विशाल प्रतिमा आज भी अपने मूल और अखंड रूप में है।

उत्तर-पूर्वNeminath Giri

22वें तीर्थंकर नेमिनाथ को समर्पित

नेमिनाथ गिरि के नाम से जाना जाता है। यहाँ 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की प्रमुख प्रतिमाएँ हैं। शंख का चिह्न नेमिनाथ की पहचान है।

प्रमुख विशाल प्रतिमाएँ

🐂

भगवान आदिनाथ (ऋषभनाथ)

ऊँचाई: 57 फुट (17 मीटर) कायोत्सर्ग

प्रथम तीर्थंकर की यह प्रतिमा पूरे परिसर में सबसे ऊँची है। पादपीठ पर बैल का चिह्न आदिनाथ की पहचान है।

🐍

भगवान पार्श्वनाथ

ऊँचाई: 19 मीटर, कायोत्सर्ग

23वें तीर्थंकर की यह भव्य प्रतिमा सर्प-फणावली से पहचानी जाती है। उर्वाही समूह की सबसे दर्शनीय प्रतिमाओं में से एक।

🐚

भगवान नेमिनाथ

ऊँचाई: 10 मीटर, पद्मासन

22वें तीर्थंकर की यह विशाल बैठी हुई प्रतिमा। पादपीठ पर शंख चिह्न नेमिनाथ की पहचान है।

🦁

भगवान महावीर

24वें तीर्थंकर, सिंह-चिह्न

24वें और अंतिम तीर्थंकर की प्रतिमाएँ परिसर में अनेक स्थानों पर हैं। सिंह पादपीठ-चिह्न से पहचानी जाती हैं।

भगवान नमिनाथ

21वें तीर्थंकर, अखंड प्रतिमा

उत्तर-पश्चिम समूह में स्थित यह एकमात्र प्रमुख प्रतिमा है जो बाबर के विध्वंस से पूरी तरह बची रही।

🌙

भगवान चंद्रप्रभु

8वें तीर्थंकर, अर्धचंद्र-चिह्न

चंद्रमा के चिह्न से युक्त यह प्रतिमा विभिन्न गुफाओं में उकेरी गई है। दक्षिण-पूर्व समूह में विशेष रूप से दर्शनीय।

🏯

ग्वालियर किले में जैन शिल्प-मंदिरों की संख्या और उनकी विशालता किसी भी अन्य स्थान पर अतुलनीय है। यह स्थल भारतीय जैन धर्म की वह गवाही है जो पत्थर में उकेरी गई है और सदियों की आँधियों के बाद भी अडिग खड़ी है।

ASI, Archaeological Survey of India

बाबर का विध्वंस और पुनरुद्धार

7वीं-8वीं सदी

प्रारंभिक निर्माण

दक्षिण-पश्चिम समूह की प्राचीनतम प्रतिमाओं का निर्माण, गुप्तोत्तर काल।

1440-1473

टोमर वंश का स्वर्ण युग

राजा डूंगरसिंह और कीर्तिसिंह टोमर के शासनकाल में अधिकांश विशाल प्रतिमाओं का निर्माण। हजारों मूर्तिकार वर्षों तक इस कार्य में लगे रहे।

1527

बाबर की विजय और विध्वंस

मुगल बादशाह बाबर ने ग्वालियर जीता। उसने अपने संस्मरण "बाबरनामा" में इन प्रतिमाओं के विध्वंस का स्वयं उल्लेख किया। उर्वाही द्वार और एक पत्थर की बावड़ी समूह की प्रतिमाओं के शीश खंडित किए गए।

1527 के बाद

जैन समाज का पुनरुद्धार

मुगल शासन के कमजोर पड़ने के बाद स्थानीय जैन समाज ने खंडित प्रतिमाओं के शीश पुनर्निर्मित करवाए।

1927

आधुनिक जीर्णोद्धार

उर्वाही समूह में 1927 के शिलालेख पुनरुद्धार कार्य के साक्ष्य हैं। ASI ने इस सम्पूर्ण धरोहर को संरक्षित घोषित किया।

📖 बाबरनामा में ग्वालियर की जैन मूर्तियाँ

इतिहास में यह विरल घटना है कि एक विजेता ने स्वयं अपने विध्वंस का उल्लेख किया। बाबर ने अपनी आत्मकथा "बाबरनामा" में ग्वालियर की जैन प्रतिमाओं का वर्णन करते हुए उनके विध्वंस का आदेश देने की बात लिखी।

इतिहासकारों के अनुसार बाबर को इन प्रतिमाओं की विशालता और कलात्मकता ने चकित किया, पर धार्मिक कारणों से उसने नग्न प्रतिमाओं को नष्ट करने का आदेश दिया। उर्वाही द्वार और एक पत्थर की बावड़ी समूह की मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त हुईं।

जो समूह दुर्गम स्थानों पर थे, विशेषकर उत्तर-पश्चिम समूह, वे बच गए। यही कारण है कि नमिनाथ की प्रतिमा आज भी अपने मूल अखंड रूप में देखी जा सकती है।

यात्रा-गाइड

✦ कैसे पहुँचें

  • ग्वालियर रेलवे स्टेशन से 3 किमी, दिल्ली से 4 घंटे
  • ग्वालियर एयरपोर्ट से 8 किमी की दूरी
  • उर्वाही गेट से प्रवेश, सड़क से ही प्रतिमाएँ दिखती हैं
  • दक्षिण-पूर्व समूह Dindayal City Mall के पास
  • उत्तर-पश्चिम समूह के लिए पैदल ट्रेक आवश्यक

यात्री के लिए सुझाव

  • सुबह 6-9 बजे का समय सबसे उपयुक्त, कम भीड़
  • मानसून में हरियाली के बीच दृश्य अलौकिक
  • जूते उतारकर गुफाओं में प्रवेश करें
  • ASI प्रवेश शुल्क लागू, भारतीय नागरिकों के लिए न्यूनतम
  • Man Singh Palace और Teli ka Mandir भी देखें
🗿

शिल्पकला की विशेषता

बलुए पत्थर में तराशी गई प्रतिमाएँ। पद्मासन और कायोत्सर्ग दोनों मुद्राएँ। प्रत्येक तीर्थंकर का अपना पहचान-चिह्न पादपीठ पर।

📜

शिलालेख और दस्तावेज़

20 से अधिक शिलालेख 1440-1473 के बीच के हैं। टोमर राजाओं के नाम, मूर्तिकारों के नाम और निर्माण-तिथियाँ दर्ज हैं।

🏛

ASI संरक्षण

Archaeological Survey of India ने इसे राष्ट्रीय महत्त्व का स्मारक घोषित किया है। नियमित जीर्णोद्धार और संरक्षण कार्य जारी है।

🏯 ग्वालियर जैन धरोहर का सार

ग्वालियर किले की जैन शिल्पकला न केवल कला का चमत्कार है, यह जैन समाज की अदम्य आस्था का प्रमाण है। जब बाबर ने इन्हें नष्ट किया, तब भी जैन समाज ने धैर्य नहीं खोया और पुनः इन्हें जीवित किया। जो प्रतिमाएँ 7वीं शताब्दी में चट्टानों में उकेरी गईं, वे आज भी ध्यानमग्न हैं, मानो संसार के तूफानों से परे, मोक्ष की ओर एकटक देख रही हों।

ग्वालियर किला Gwalior Fort गोपाचल पर्वत सिद्धाचल गुफाएँ जैन शिल्पकला Jain Rock Cut उर्वाही द्वार टोमर वंश बाबरनामा तीर्थंकर प्रतिमाएँ मध्य प्रदेश धरोहर ASI Heritage

स्रोत और संदर्भ

तथ्य और जानकारी के प्रमुख स्रोत
Primary ReferenceWikipedia, Gopachal Rock-Cut Jain Monuments

पाँच समूहों का इतिहास, शिलालेख और बाबर के विध्वंस का विवरण

Caves ReferenceWikipedia, Siddhachal Caves

उर्वाही समूह, 22 विशाल प्रतिमाएँ और पुनरुद्धार का विवरण

Fort ReferenceWikipedia, Gwalior Fort

ग्वालियर किले का इतिहास, 11 जैन मंदिर और आदिनाथ प्रतिमा की ऊँचाई

Tourism ReferenceMP Tourism, Gwalior Fort

पार्श्वनाथ, नेमिनाथ और आदिनाथ की प्रमुख प्रतिमाओं का विवरण