धरोहर BY JAINKART · जैन ज्ञान श्रृंखला
जैन धर्म के
24 तीर्थंकर
तीर्थंकर वे महान आत्माएँ हैं जिन्होंने स्वयं मोक्ष प्राप्त किया और अपने ज्ञान से संसार-सागर पार करने का मार्ग बनाया। इस अवसर्पिणी काल में 24 तीर्थंकर हुए। ऋषभदेव से महावीर तक, हर तीर्थंकर का जीवन एक अलग प्रेरणा है।
जैन धर्म में तीर्थंकर का अर्थ है वह जो तीर्थ बनाए, यानी संसार-सागर पार करने का मार्ग। तीर्थंकर स्वयं अपने पुरुषार्थ से केवलज्ञान प्राप्त करते हैं और चतुर्विध संघ की स्थापना करते हैं। वे ईश्वर नहीं हैं जो सृष्टि बनाते हों, वे आदर्श हैं जिनके मार्ग पर चलकर कोई भी आत्मा मोक्ष पा सकती है।
"तीर्थंकर न किसी को दंड देते हैं, न पुरस्कार। वे केवल मार्ग दिखाते हैं। चलना हमें स्वयं है। उनका जीवन ही उनका उपदेश है।"
जैन दर्शन की मूल दृष्टितीर्थंकर कौन होते हैं?
तीर्थंकर वह आत्मा है जिसने पूर्व जन्मों में तीर्थंकर नाम कर्म अर्जित किया हो। यह कर्म अत्यंत दुर्लभ होता है और विशेष साधना और भावनाओं से ही बँधता है।
प्रत्येक तीर्थंकर के जीवन में पाँच प्रमुख घटनाएँ होती हैं जिन्हें पाँच कल्याणक कहते हैं। च्यवन कल्याणक, जन्म कल्याणक, दीक्षा कल्याणक, केवलज्ञान कल्याणक और निर्वाण कल्याणक। इन पाँचों अवसरों पर देवता भी उत्सव मनाते हैं।
तीर्थंकर केवलज्ञान प्राप्ति के बाद चतुर्विध संघ की स्थापना करते हैं जिसमें साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका होते हैं।
24 तीर्थंकर, नाम, चिह्न और निर्वाण स्थल
| क्र. | नाम | चिह्न | निर्वाण स्थल |
|---|---|---|---|
| 1 | ऋषभदेव (आदिनाथ) | 🐂 वृषभ | अष्टापद (कैलाश) |
| 2 | अजितनाथ | 🐘 हाथी | सम्मेद शिखर |
| 3 | संभवनाथ | 🐴 अश्व | सम्मेद शिखर |
| 4 | अभिनंदननाथ | 🐒 वानर | सम्मेद शिखर |
| 5 | सुमतिनाथ | 🐦 चकवा | सम्मेद शिखर |
| 6 | पद्मप्रभनाथ | 🪷 कमल | सम्मेद शिखर |
| 7 | सुपार्श्वनाथ | 卍 स्वस्तिक | सम्मेद शिखर |
| 8 | चंद्रप्रभनाथ | 🌙 चंद्रमा | सम्मेद शिखर |
| 9 | सुविधिनाथ (पुष्पदंत) | 🐊 मकर | सम्मेद शिखर |
| 10 | शीतलनाथ | 🪴 श्रीवत्स | सम्मेद शिखर |
| 11 | श्रेयांसनाथ | 🦏 गैंडा | सम्मेद शिखर |
| 12 | वासुपूज्यनाथ | 🐃 भैंसा | चंपापुरी |
| 13 | विमलनाथ | 🐗 वराह | सम्मेद शिखर |
| 14 | अनंतनाथ | 🐻 भालू | सम्मेद शिखर |
| 15 | धर्मनाथ | ⚡ वज्र | सम्मेद शिखर |
| 16 | शांतिनाथ | 🦌 हिरण | सम्मेद शिखर |
| 17 | कुंथुनाथ | 🐐 अज | सम्मेद शिखर |
| 18 | अरनाथ | 🐟 मत्स्य | सम्मेद शिखर |
| 19 | मल्लिनाथ | 🏺 कलश | सम्मेद शिखर |
| 20 | मुनिसुव्रतनाथ | 🐢 कच्छप | सम्मेद शिखर |
| 21 | नमिनाथ | 🪷 नीलकमल | सम्मेद शिखर |
| 22 | नेमिनाथ (अरिष्टनेमि) | 🐚 शंख | गिरनार |
| 23 | पार्श्वनाथ | 🐍 सर्प | सम्मेद शिखर |
| 24 | महावीर स्वामी | 🦁 सिंह | पावापुरी |
तीन विशेष तीर्थंकर
ऋषभदेव (आदिनाथ) इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर हैं। वे मानव सभ्यता के आदि प्रवर्तक भी माने जाते हैं। उन्होंने मनुष्यों को असि, मसि और कृषि यानी शस्त्र, लेखन और खेती सिखाई।
उनके 100 पुत्र थे जिनमें भरत सबसे बड़े थे। भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारत पड़ा। ऋषभदेव ने अष्टापद पर्वत पर निर्वाण प्राप्त किया।
नेमिनाथ श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे। उनकी विवाह-यात्रा में जब उन्होंने पशुओं की हत्या होते देखी तो उसी समय वैराग्य हो गया और उन्होंने गृहत्याग कर दिया।
उन्होंने गिरनार पर्वत पर साधना की और निर्वाण प्राप्त किया। गिरनार आज भी जैन धर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है।
पार्श्वनाथ महावीर से लगभग 250 वर्ष पहले हुए। उन्होंने चार व्रत की शिक्षा दी जिसमें महावीर ने बाद में ब्रह्मचर्य जोड़कर पाँच व्रत किए।
उनका चिह्न सर्प है क्योंकि एक बार उन्होंने अपनी साधना में सर्पों की रक्षा की थी। वे सम्मेद शिखर पर निर्वाण को प्राप्त हुए।
✨ पाँच कल्याणक, तीर्थंकर जीवन के पाँच महोत्सव
च्यवन कल्याणक वह क्षण है जब तीर्थंकर की आत्मा पूर्व जन्म से च्यवन करके माता के गर्भ में आती है। इस समय माता को 14 स्वप्न आते हैं।
जन्म कल्याणक पर इंद्र स्वयं तीर्थंकर के जन्म का उत्सव मनाते हैं और मेरु पर्वत पर अभिषेक करते हैं। यही परंपरा आज जन्म अभिषेक के रूप में मंदिरों में होती है।
दीक्षा कल्याणक पर तीर्थंकर समस्त सांसारिक बंधन त्यागकर साधु जीवन अपनाते हैं। केवलज्ञान कल्याणक पर उन्हें सर्वज्ञता प्राप्त होती है और निर्वाण कल्याणक पर वे समस्त कर्मों से मुक्त होकर सिद्धशिला पर विराजते हैं।
तीर्थंकरों के प्रमुख निर्वाण स्थल
सम्मेद शिखर, झारखंड
20 तीर्थंकरों का निर्वाण स्थल। जैन धर्म का सर्वोच्च तीर्थ। पार्श्वनाथ पहाड़ी पर स्थित।
अष्टापद, कैलाश
ऋषभदेव का निर्वाण स्थल। मान्यता है कि यह हिमालय में कैलाश पर्वत के पास है।
गिरनार, गुजरात
नेमिनाथ का निर्वाण स्थल। गुजरात के जूनागढ़ में स्थित। 3800 से अधिक सीढ़ियाँ।
पावापुरी, बिहार
महावीर स्वामी का निर्वाण स्थल। कमल सरोवर और जल मंदिर। 527 ईसा पूर्व।
चंपापुरी, बिहार
12वें तीर्थंकर वासुपूज्यनाथ का निर्वाण स्थल। भागलपुर के पास स्थित।
अन्य तीर्थ
शत्रुंजय, आबू पर्वत, रणकपुर जैसे स्थलों पर भी तीर्थंकरों से जुड़े ऐतिहासिक मंदिर।
जैन धर्म में तीर्थंकर की पूजा इसलिए नहीं होती कि वे कुछ देंगे। पूजा इसलिए होती है कि उनके गुणों का ध्यान करते हुए हम स्वयं उन गुणों को अपने जीवन में उतार सकें। तीर्थंकर वंदनीय हैं, आराध्य नहीं।
जैन पूजा की दार्शनिक व्याख्या📿 24 तीर्थंकरों का सार
24 तीर्थंकर जैन धर्म के आदर्श हैं। प्रत्येक तीर्थंकर ने यह सिद्ध किया कि कोई भी आत्मा, चाहे वह राजा हो या सामान्य मनुष्य, अपने पुरुषार्थ से मोक्ष प्राप्त कर सकती है। ऋषभदेव ने सभ्यता का आरंभ किया, महावीर ने उसे पूर्णता दी और उनके बीच के 22 तीर्थंकरों ने यह परंपरा अनवरत जीवित रखी।

