मेतार्य मुनि
एक पक्षी की जान, एक मुनि की मुक्ति
जब अहिंसा इतनी गहरी हो कि अपनी जान देकर किसी की जान बचाई जाए
जैन धर्म में अहिंसा केवल शब्द नहीं है। यह उस ऊँचाई तक जाती है जहाँ एक मुनि अपनी जान देकर एक पक्षी की जान बचाते हैं, और उस परम त्याग के क्षण में उन्हें केवलज्ञान मिलता है। मेतार्य मुनि की यह कथा अहिंसा और समभाव का सबसे जीवंत प्रमाण है।
कौन थे मेतार्य मुनि?
मेतार्य मुनि भगवान महावीर के प्रमुख शिष्यों में से एक थे।[१] उनका जन्म एक अछूत (अस्पृश्य) परिवार में हुआ था। किंतु जैन धर्म ने जाति-भेद को कभी नहीं माना। भगवान महावीर के संघ में उन्हें उसी सम्मान से दीक्षा दी गई जो किसी राजकुमार को दी जाती।[१] यही जैन धर्म की सबसे क्रांतिकारी विशेषता थी।
जैन धर्म में कहा गया है: "जो आत्मा तप और संयम से शुद्ध हो, वही श्रेष्ठ है।" जाति, कुल, धन, सब गौण हैं। मेतार्य मुनि इस सिद्धांत के जीते-जागते प्रमाण थे।[१]
वह भीषण गर्मी का दिन
एक बार भीषण गर्मी के दिन मेतार्य मुनि भिक्षा के लिए निकले।[१] एक सुनार के घर के पास से गुजरते हुए उन्होंने देखा कि सुनार के घर के बाहर एक सारस पक्षी बाँधा हुआ था। सुनार सोने को गलाने के काम में व्यस्त था।
अचानक उस सारस ने सुनार के बर्तन में रखे सोने के दाने निगल लिए।[१] सुनार को इसकी खबर नहीं थी। उसने इधर-उधर सोने के दाने ढूंढे, नहीं मिले। उसकी नजर मुनि पर पड़ी जो उस वक्त वहीं से गुजर रहे थे।
सुनार ने मान लिया कि मुनि ने उसके सोने के दाने चुरा लिए हैं। वह क्रोध में भर गया। उसने मुनि को पकड़ा और बिना कुछ सुने, उनके हाथ-पैर चमड़े की रस्सी से बाँध दिए और धूप में खड़ा कर दिया।
मुनि की वह अटल चुप्पी
मेतार्य मुनि जानते थे कि सोने के दाने उस सारस पक्षी ने निगले हैं।[१] एक शब्द बोलने से उनकी जान बच सकती थी। किंतु वे चुप रहे। क्योंकि यदि उन्होंने बताया कि सोना पक्षी के पेट में है, तो सुनार उस पक्षी को तत्काल मार देगा और उसका पेट चीर देगा।
मुनि ने सोचा: "यह शरीर नाशवान है। इसकी पीड़ा क्षणिक है। किंतु एक जीव की हत्या का पाप अनंत काल तक भोगना होगा। पक्षी की जान मेरी जान से बड़ी है।"[१]
चमड़े की रस्सी धूप में सिकुड़ती जा रही थी। शरीर पर जकड़न बढ़ती जा रही थी। असह्य पीड़ा थी। फिर भी मुनि के मन में एक लहर भी नहीं उठी। वे अपने भाव में, अपने समभाव में, अडिग खड़े थे।
जैनवर्ल्ड, मुनि मेतार्य की कथा [१]
घटनाक्रम: कथा का नाटकीय मोड़
मेतार्य मुनि को केवलज्ञान तब मिला जब उन्होंने तीव्र शारीरिक पीड़ा में भी मन को पूर्ण समभाव में रखा। न क्रोध, न भय, न पश्चाताप, न अपेक्षा। केवल शुद्ध चेतना।
जैन दर्शन कहता है कि केवलज्ञान बाहर से नहीं आता, वह आत्मा के भीतर ही है। जब सभी कषाय पूरी तरह समाप्त होती हैं, तब वह स्वयं प्रकट होता है। मेतार्य मुनि के साथ यही हुआ।[२]
इस कथा के तीन केंद्रीय मूल्य
अहिंसा
एक पक्षी की जान बचाने के लिए अपनी जान देना। यह अहिंसा का सर्वोच्च रूप है।[१]
समभाव
सुख और दुःख, सम्मान और अपमान, दोनों में एकसमान रहना। पीड़ा में भी मन का न डोलना ही समभाव है।[१]
क्षमा
जिसने अन्याय किया, उसे भी पूर्ण क्षमा। बिना शर्त, बिना अपेक्षा। यही क्षमावीरस्य भूषणम् है।[३]
जाति-भेद पर जैन धर्म की क्रांति
मेतार्य मुनि की कथा केवल अहिंसा की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की भी कथा है। वे अछूत परिवार में जन्मे थे, फिर भी भगवान महावीर के शिष्य बने।[१] यह उस युग में जब वर्ण-व्यवस्था अपने चरम पर थी, एक असाधारण सामाजिक क्रांति थी।
- भगवान महावीर के प्रत्यक्ष शिष्य, अछूत परिवार में जन्मे[१]
- जैन संघ में उन्हें जाति के आधार पर नहीं, आत्मिक योग्यता के आधार पर दीक्षा मिली[१]
- एक सारस पक्षी की जान बचाने के लिए झूठा आरोप सहा, एक शब्द भी नहीं बोला[१]
- चमड़े की कसती रस्सी की यातना में भी पूर्ण समभाव बनाए रखा[१]
- उसी अंतिम क्षण में केवलज्ञान प्राप्त किया और मोक्ष को प्राप्त हुए[१]

