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Library > जैन कथा संग्रह
चंद्रप्रभ स्वामी - अष्टम तीर्थंकर की दिव्य जीवन-गाथा

चंद्रप्रभ स्वामी जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर हैं। उनका प्रतीक चिह्न चंद्रमा है,
जो शीतलता और शांति का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने अहिंसा, सत्य
और संयम का उपदेश देकर जीवों को मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित किया।
उनकी पूजा से साधक को मानसिक शांति और आत्मिक उत्थान की अनुभूति होती है।

नंदीषेण अहंकार से पतन और पुनरुत्थान

नंदीषेण की कथा जैन धर्म में अहंकार और उसके परिणामों को उजागर करती है।
अत्यधिक गर्व और अहंकार के कारण उनका पतन हुआ, जिससे उन्होंने कष्ट और अपमान का अनुभव किया।
परंतु आत्मचिंतन और धर्म की ओर लौटकर उन्होंने पुनरुत्थान का मार्ग चुना।
यह प्रसंग यह संदेश देता है कि अहंकार विनाश का कारण है, जबकि विनम्रता और धर्म पुनरुत्थान का आधार बनते हैं।

मेघकुमार राजकुमार जिसने धर्म चुना

मेघकुमार जैन धर्म के इतिहास में एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व हैं।
राजसी वैभव और सुख-सुविधाओं से युक्त जीवन होने के बावजूद
उन्होंने धर्म का मार्ग चुना। भगवान महावीर के उपदेशों से प्रभावित
होकर उन्होंने सांसारिक मोह का त्याग किया। 

राजा श्रेणिक - भक्ति, पाप और मोक्ष का वायदा

राजा श्रेणिक जैन धर्म के इतिहास में एक प्रमुख व्यक्तित्व माने जाते हैं।
वे भगवान महावीर के महान भक्त थे और उनके उपदेशों से गहराई से प्रभावित हुए।
श्रद्धा के साथ उन्होंने भक्ति का पालन किया, परंतु सांसारिक जीवन में पापों का भी सामना किया।
महावीर के मार्गदर्शन से उन्होंने मोक्ष की ओर अग्रसर होने का वायदा किया और आत्मिक उत्थान का संकल्प लिया।

नेमिनाथ भगवान

भगवान नेमिनाथ जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर थे,
जिनका जन्म शौरीपुर में हुआ और वे श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे।
विवाह-मंडप जाते समय बाड़े में बंद पशुओं की करुण चीख सुनकर उनके
मन में तत्काल वैराग्य उत्पन्न हो गया और उन्होंने सारी बारात वहीं छोड़ दी।

मेतार्य मुनि: एक पक्षी की जान, एक मुनि की मुक्ति

मेतार्य मुनि, भगवान महावीर के शिष्य, एक अछूत परिवार में जन्मे पर साधुता में सबसे ऊँचे उठे।
एक सुनार ने उन पर झूठा आरोप लगाया, चमड़े की रस्सी से बाँधकर धूप में छोड़ दिया।
जिस पक्षी की जान बचाने के लिए उन्होंने चुप्पी साधी, उसी चुप्पी ने उन्हें केवलज्ञान दिया।
अहिंसा का यह सबसे अनोखा रूप है जहाँ अपनी जान देकर किसी की जान बचाई जाए।

भरत और बाहुबली : जैन धर्म की प्रेरणादायक कहानी

पहले तीर्थंकर ऋषभदेव के दो पुत्र, एक चाहता था सारी दुनिया, दूसरे ने सब ठुकरा दिया।
तीन युद्ध हुए, तीनों में बाहुबली जीते, फिर भी राज्य छोड़ दिया।
बारह साल का तप, बेलें चढ़ गईं, पर एक सूक्ष्म अहंकार ज्ञान रोकता रहा।
जिस दिन वह अहंकार टूटा, उसी दिन मोक्ष का द्वार खुला।

चंदनबाला: दासता से साध्वीत्व तक

राजकुमारी वसुमती, जो युद्ध में दासी बनीं, आगे चलकर जैन धर्म की प्रथम साध्वी बनीं।
भगवान महावीर ने उनके हाथ से पाँच महीने अट्ठाईस दिन का अभिग्रह तोड़ा।
अपमान, भूख और बेड़ियों में भी उन्होंने धर्म और शील को नहीं छोड़ा।
चंदनबाला की कथा आज भी करुणा, त्याग और स्त्री-अधिकार का शाश्वत संदेश देती है।

तेईसवें तीर्थंकर भगवान् पार्श्वनाथ

काशी में जन्मे पार्श्वनाथ का जीवन एक सर्प-घटना से शुरू हुआ,
उन्होंने तपस्वी कमठ की अग्नि से सर्प युगल को बचाया, जो बाद में धरणेन्द्र बने।
कमठ ने मेघमाली देव के रूप में पार्श्वनाथ को घोर उपसर्ग दिए,
किंतु वे अविचल रहे और सम्मेतशिखर पर मोक्ष प्राप्त कर अमर हुए।

राजा श्रीपाल

यह कथा सिद्धचक्र के महत्व को दर्शाती है। 
राजा श्रीपाल का कुष्ठ रोग सिद्धचक्र के आराधन से ठीक हो गया था, 
और उन्हें आठ पत्नियाँ, नौ पुत्र, प्रचुर धन-संपत्ति
तथा नौ वर्षों तक निष्कंटक राज्य प्राप्त हुआ।