चंदनबाला
दासता से साध्वीत्व तक
राजकुमारी वसुमती, जो बनीं भगवान महावीर की प्रथम साध्वी
जैन धर्म के इतिहास में १६ महासतियों का स्मरण होता है। उनमें सबसे पहला नाम है, महासती चंदनबाला का। यह कथा है एक राजकुमारी की जिसे युद्ध में दासी बना दिया गया, जिसे भूखा-प्यासा बेड़ियों में जकड़ा गया, और जिसके हाथ से भगवान महावीर ने अपना ५ महीने २८ दिन का कठोर अभिग्रह तोड़ा। यही वसुमती, आगे चलकर ३६,००० साध्वियों की प्रमुख बनी।
राजकुमारी वसुमती का जन्म
चंपा नगरी के राजा दधिवाहन और रानी धारिणी की पुत्री वसुमती अत्यंत सुंदर, विदुषी और धर्मनिष्ठ थी।[१] बचपन से ही उनके मन में संसार के प्रति वैराग्य था। उनके माता-पिता ने उनकी इस भावना को समझकर स्वेच्छा से उन्हें अपने संकल्प में दृढ़ रहने की अनुमति दी।[१]
वसुमती का जन्म चंपा (वर्तमान भागलपुर, बिहार) में हुआ था। यह नगरी उस काल में मगध साम्राज्य के निकट एक समृद्ध राज्य की राजधानी थी।[२]
युद्ध, अपहरण और दासता
एक दिन कौशांबी के राजा शतानिक ने चंपा पर आक्रमण कर दिया।[१] युद्ध में राजा दधिवाहन पराजित हुए। एक ऊँट व्यापारी ने छोटी वसुमती और उनकी माता को पकड़ लिया। रास्ते में माता की मृत्यु हो गई और अनाथ वसुमती को दास-बाज़ार में बेचने के लिए ले जाया गया।[२]
दास-बाज़ार में एक जैन सेठ धनावह (जिन्हें कहीं-कहीं धनदत्त भी कहा गया है) ने वसुमती को देखकर पहचाना कि यह कोई राजकुमारी है।[२] उन्होंने उसे खरीदकर मुक्त किया और अपनी पुत्री की भाँति घर ले आए। अपने सौंदर्य के कारण उसे "चंदनबाला" नाम मिला, जिसका अर्थ है "चंदन जैसे केश वाली।"[२]
एक राजकुमारी को दास-बाज़ार में खड़ा देखकर सेठ धनावह का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने सोचा, यदि यह किसी नीच के हाथ पड़ गई तो इसका क्या होगा। करुणा से उन्होंने उसे खरीदा और पुत्री बनाकर घर लाए।
जैनपीडिया, चंदनबाला की कथा [२]
सेठानी की ईर्ष्या, घोर अपमान
सेठ धनावह की पत्नी मूला को जब पता चला कि उनके पति चंदनबाला पर पुत्री जैसा स्नेह रखते हैं, तो उन्हें ईर्ष्या होने लगी।[३] एक दिन जब सेठ घर पर नहीं थे, सेठानी मूला ने चंदनबाला के सुंदर बाल काट दिए, पाँवों में बेड़ियाँ डाल दीं और उसे एक अँधेरी कोठरी में बंद कर दिया। खाने को केवल उड़द के बाकुले दिए और तीन दिन तक कुछ नहीं खाने दिया।[४]
भगवान महावीर का अभिग्रह
उन्हीं दिनों भगवान महावीर तपस्यारत थे। उन्होंने एक कठोर अभिग्रह (संकल्प) लिया था कि वे केवल उसी स्त्री के हाथ से भिक्षा लेंगे जिसमें ये सभी शर्तें एकसाथ हों।[४]
- १स्त्री जो राजकुमारी हो किंतु दासी की स्थिति में हो
- २जिसका सिर मुंडा हुआ हो
- ३जिसके पाँवों में बेड़ियाँ हों
- ४जो तीन दिन से भूखी हो
- ५भिक्षा में केवल उड़द के बाकुले हों
- ६दाता का एक पैर देहली के अंदर और एक पैर बाहर हो, और आँखों में आँसू हों
पाँच महीने और अट्ठाईस दिन बीत गए।[३] पूरे नगर में यह चर्चा थी कि भगवान की भिक्षा कौन देगा। अनेक श्रेष्ठी और श्राविकाओं ने प्रयास किए, किंतु कोई न कोई शर्त अधूरी रह जाती थी।
वह अलौकिक क्षण
एक दिन भगवान महावीर उस नगरी में भिक्षा के लिए निकले। घूमते-घूमते वे धनावह सेठ के घर के सामने पहुँचे। कोठरी में बंद चंदनबाला को किसी प्रकार पता चला कि प्रभु द्वार पर हैं।[५] वह दरवाज़े पर आई, एक पैर देहली के अंदर, एक पैर बाहर। हाथ में उड़द के बाकुले। सिर मुंडा, पाँवों में बेड़ियाँ, तीन दिन से भूखी।
भगवान ने देखा कि पाँच शर्तें पूरी हैं, किंतु आँखों में आँसू नहीं। वे मुड़कर जाने लगे। यह देखकर चंदनबाला की आँखें भर आईं।[६] भगवान ने पलटकर देखा, छह शर्तें पूरी थीं। उन्होंने चंदनबाला के हाथ से उड़द के बाकुले ग्रहण किए। उसी क्षण आकाश से पुष्प-वृष्टि हुई, देवताओं ने "अहो दानम् अहो दानम्" का उद्घोष किया।[४]
उस दिन एक दासी ने वह किया जो पूरी नगरी के श्रेष्ठी नहीं कर सके। भगवान ने सिद्ध किया कि दान की पात्रता जाति से नहीं, शील और भाव से होती है।
जैनवर्ल्ड, चंदनबाला की कथा [६]
मुक्ति, दीक्षा और केवलज्ञान
उस चमत्कारी घटना के बाद नगरवासियों ने चंदनबाला की वास्तविकता जानी। सेठ धनावह ने उन्हें मुक्त किया और उचित सम्मान दिया।[५] बाद में जब भगवान महावीर को केवलज्ञान प्राप्त हुआ, तब चंदनबाला उनकी देशना सुनकर वैराग्यभाव से भर गईं। उन्होंने भगवान के हाथों दीक्षा ली और जैन संघ की प्रथम साध्वी बनीं।[७]
- भगवान महावीर द्वारा स्थापित साध्वी संघ की प्रथम साध्वी[१]
- ३६,००० साध्वियों की प्रमुख (साध्वी-प्रमुख) के रूप में संघ का नेतृत्व[३]
- कल्पसूत्र में उल्लेख कि महावीर के समय संघ में ३६,००० साध्वियाँ, १४,००० मुनि, १,५९,००० श्रावक और ३,१८,००० श्राविकाएँ थीं[३]
- जैन परंपरा की १६ महासतियों में प्रथम स्थान पर[१]
- तपस्या से केवलज्ञान प्राप्त किया और अंततः मोक्ष को प्राप्त हुईं[७]
इस कथा से पाँच शाश्वत संदेश
जाति नहीं, शील बड़ा है
एक दासी के हाथ से भगवान ने भिक्षा ली। यह जैन धर्म का सबसे क्रांतिकारी संदेश था कि धर्म का अधिकार सभी को है।[१]
कर्म का फल अटल है
राजकुमारी का दासत्व पूर्व-कर्म का फल था। किंतु शील और धर्म से वह फल भी परिवर्तित हो सकता है।[७]
स्त्री को धार्मिक अधिकार
भगवान महावीर ने उस युग में स्त्री को संन्यास का पूर्ण अधिकार दिया। चंदनबाला इस क्रांति की प्रतीक हैं।[४]
ईर्ष्या सबसे बड़ा अधर्म है
सेठानी मूला की ईर्ष्या ने एक निरपराध को यातना दी। यह कथा मन की शुद्धि का संदेश देती है।[५]
विपत्ति में भी शील अखंड रखें
बेड़ियों में जकड़ी, भूखी, अपमानित चंदनबाला ने कभी धर्म नहीं छोड़ा। यही उनकी महानता है।[३]
करुणा से बड़ा कोई धर्म नहीं
सेठ धनावह की करुणा ने एक राजकुमारी को दासता से बचाया। एक पल की करुणा इतिहास बदल सकती है।[२]
स्रोत एवं संदर्भ सूची
इस लेख की सभी ऐतिहासिक और आगमिक जानकारी प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित है।
चंदनबाला की जीवनी, १६ महासतियों में स्थान और ३६,००० साध्वी संघ का विस्तृत विवरण।
चंदनबाला का नाम-इतिहास, राजकुमारी से दासी बनने का विस्तृत विवरण और जैन परंपरा में महत्व।
कल्पसूत्र के अनुसार महावीर संघ का विस्तार और चंदनबाला की साध्वी-प्रमुख के रूप में भूमिका।
अभिग्रह की छह शर्तें, पारणा का प्रसंग और "अहो दानम्" का उद्घोष, हिंदी विवरण।
भगवान महावीर का पारणा, चंदनबाला की आँखों में आँसू और मोक्ष-प्राप्ति का वर्णन।
राजकुमारी वसुमती से चंदनबाला तक की यात्रा, दीक्षा और केवलज्ञान प्राप्ति का सारांश।

