नेमिनाथ भगवान
जिस क्षण करुणा ने
विवाह-मंडप मोड़ दिया
जब बारात निकली थी, तब पूरा द्वारका नगर उत्सव में डूबा था। पर एक पशुओं की चीख ने इतिहास की धारा मोड़ दी और एक राजकुमार का जीवन हमेशा के लिए बदल गया।
यह कथा केवल एक तीर्थंकर के त्याग की नहीं है। यह उस क्षण की कथा है जब एक इंसान ने अपनी सबसे बड़ी खुशी की दहलीज़ पर खड़े होकर यह प्रश्न पूछा: "क्या मेरी प्रसन्नता के लिए किसी निर्दोष का रक्त बहना उचित है?" और उत्तर में उन्होंने संसार छोड़ दिया।
शौरीपुर में जन्म: कृष्ण के चचेरे भाई
भगवान नेमिनाथ का जन्म शौरीपुर (आधुनिक मथुरा के निकट) के यादव वंश में हुआ।[१] उनके पिता समुद्रविजय और माता शिवादेवी थे। यदुवंश के ही एक अन्य शाखा में वसुदेव के पुत्र थे: श्रीकृष्ण। इस प्रकार नेमिनाथ और कृष्ण चचेरे भाई थे।[२]
जैन परंपरा के अनुसार नेमिनाथ भगवान उत्तम शरीर, असाधारण बल और अलौकिक तेज के धनी थे। बचपन से ही उनका मन संसार की माया-ममता से ऊपर था। कई बार कृष्ण और यदुवंश के बड़े-बुज़ुर्गों ने उन्हें विवाह के लिए मनाने की कोशिश की, पर उनका चित्त वैराग्य की ओर झुका रहा।[३]
राजीमती से विवाह का प्रस्ताव
जब काफी अनुनय-विनय के बाद नेमिकुमार ने विवाह की स्वीकृति दी, तो कृष्ण स्वयं द्वारका के राजा उग्रसेन के पास पहुँचे।[४] उग्रसेन की पुत्री राजीमती (राजुलकुमारी): जो कृष्ण की पत्नी सत्यभामा की छोटी बहन थीं: से नेमिकुमार के विवाह की बात तय हुई।[३]
राजीमती परम सुंदरी और गुणवती थीं। उन्होंने अपने हृदय से नेमिकुमार को वर लिया था। पूरे द्वारका नगर में उत्सव का माहौल था। विवाह का मुहूर्त निकाला गया, और बारात की तैयारियाँ होने लगीं।
नेमिकुमार की बारात और त्याग: जैन लघुचित्र। © Wikimedia Commons (Public Domain)
वह क्षण जिसने सब बदल दिया
बारात निकली। हाथी, घोड़े, रथ, वाद्ययंत्र: पूरा राजमहल उत्सव में डूबा था। नेमिकुमार सजे-धजे रथ पर बैठे राजीमती के घर की ओर चल रहे थे। तभी रास्ते में उन्हें एक बाड़े में बंद पशुओं की करुण चीखें सुनाई दीं।[१]
नेमिकुमार ने रथ रुकवाया और पूछा: "ये पशु यहाँ क्यों बंद हैं? इनकी इतनी करुण आवाज़ क्यों?" सेवकों ने बताया: "कुमार, ये आपके विवाह-भोज के लिए मारे जाने वाले हैं।"[५]
"क्या मेरी प्रसन्नता के लिए इन निरीह जीवों की हत्या होगी? जो विवाह इतने प्राणों के रक्त पर खड़ा हो, वह मुझे स्वीकार नहीं।"
नेमिकुमार का संकल्प, जैन परंपरा के अनुसार [५]
उसी क्षण नेमिकुमार के मन में वैराग्य का उदय हुआ। उन्होंने पशुओं को मुक्त करवाया, विवाह के वस्त्र और आभूषण उतार दिए, और रथ को द्वारका की ओर नहीं बल्कि गिरनार पर्वत की ओर मोड़ दिया।[६]
वैराग्य की पाँच घड़ियाँ: उस एक दिन में
बारात की निकासी
नेमिकुमार विवाह के लिए सहमत हुए, बारात निकली। पूरा यदुवंश उत्साहित था।
पशुओं की चीख
रास्ते में बाड़े में बंद पशुओं की करुण चीख सुनी। नेमिकुमार का हृदय पिघल गया।
पशुओं की मुक्ति
उन्होंने बाड़ा खुलवाया और सभी पशुओं को मुक्त कर दिया।
वस्त्र और आभूषण त्याग
विवाह के परिधान उतार दिए। कई लोगों के समझाने पर भी नहीं माने।
गिरनार की ओर प्रस्थान
गिरनार (उर्जयंत गिरि) पर पहुँचकर केशलुंचन किया और दीक्षा ग्रहण की।
गिरनार पर तपस्या और केवलज्ञान
गिरनार पर्वत पर नेमिनाथ भगवान ने घोर तपस्या आरंभ की। जैन परंपरा के अनुसार दीक्षा के मात्र ५४वें दिन उन्होंने क्षपक-श्रेणी में प्रवेश किया और शीघ्र ही केवलज्ञान (सर्वज्ञता) की प्राप्ति हुई।[२]
इस प्रकार नेमिनाथ भगवान ने जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर के रूप में अपना दिव्य समवशरण स्थापित किया और सैकड़ों वर्षों तक अहिंसा, करुणा और मोक्षमार्ग का उपदेश दिया।[७]

गिरनार पर्वत पर जैन मंदिर समूह: नेमिनाथ भगवान का मोक्ष-तीर्थ, जूनागढ़, गुजरात। © Wikimedia Commons (Public Domain)
जब राजीमती को पता चला कि नेमिनाथ ने विवाह छोड़कर दीक्षा ले ली है, तो पूरे उग्रसेन के राजभवन में शोक छा गया। कई लोगों ने उन्हें दूसरा वर खोजने की सलाह दी।[६]
नेमिनाथ के भाई रथनेमि ने राजीमती के पास आकर कहा: "भाभी, नेमि तो वीतराग हो गए, अब मुझसे विवाह कर लो।" राजीमती ने दृढ़ता से उत्तर दिया: "मैं नेमिनाथ की अनुगामिनी बनने का संकल्प कर चुकी हूँ, कोई मुझे नहीं डिगा सकता।"[४]
अंततः राजीमती स्वयं गिरनार पहुँची, नेमिनाथ भगवान से दीक्षा ग्रहण की और एक महान तपस्विनी बनीं। जैन परंपरा उन्हें इस युग के चौथे काल में मोक्ष प्राप्त करने वाली प्रथम स्त्री मानती है।[८]
मोक्ष: गिरनार पर परम-विराम
भगवान नेमिनाथ ने गिरनार पर्वत पर एक हज़ार वर्ष की आयु पूर्ण करते हुए आषाढ़ शुक्ल अष्टमी के दिन मोक्ष प्राप्त किया।[८] उनके बाद अगले 81,000 वर्षों बाद 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए।

नेमिनाथ भगवान की प्रतिमा, गिरनार पर्वत, गुजरात। © Wikimedia Commons
- गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित, यह पर्वत जैन धर्म के सबसे पवित्र तीर्थों में से एक है[१]
- यहाँ नेमिनाथ मंदिर है जिसमें उनकी काली पाषाण प्रतिमा विराजमान है[८]
- पर्वत पर पाँच शिखर हैं, जिनमें से एक पर मुख्य नेमिनाथ मंदिर स्थित है
- गिरनार को "उर्जयंत गिरि" या "रैवतक" भी कहा जाता है: प्राचीन काल से यह जैन संतों की साधना-भूमि रही है
- आषाढ़ शुक्ल पक्ष में यहाँ नेमिनाथ मोक्ष-कल्याणक महोत्सव मनाया जाता है, लाखों श्रद्धालु आते हैं
इस कथा से पाँच दीप्तिमान संदेश
अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है
नेमिनाथ ने अपना विवाह उस क्षण छोड़ दिया जब पता चला कि इसके लिए पशु-हिंसा होगी। अहिंसा उनके लिए व्यक्तिगत सुख से बड़ी थी।[५]
करुणा देरी नहीं करती
नेमिनाथ ने सोचा नहीं: "कल से शुरू करूँगा।" जिस क्षण करुणा जागी, उसी क्षण संकल्प बदल गया। सच्चा वैराग्य तात्कालिक होता है।
राजीमती का संकल्प: स्त्री-शक्ति का आदर्श
दबाव, अकेलापन और उपहास सहते हुए भी राजीमती ने अपना मार्ग नहीं छोड़ा। अंततः वे मोक्ष-प्राप्त हुईं।[८]
संबंध आत्मा को नहीं रोकते
कृष्ण जैसे महान मित्र और राजीमती जैसी प्रेमिका होते हुए भी नेमिनाथ ने संसार त्यागा। प्रेम और मोक्ष दोनों का सम्मान किया।
एक पशु की आवाज़ भी परिवर्तन का कारण बन सकती है
नेमिनाथ की पूरी जीवन-यात्रा एक पल से बदली: जब उन्होंने एक बाड़े में बंद पशुओं की पीड़ा सुनी। हर आत्मा की पुकार मायने रखती है।
वैराग्य समाज-विरोध नहीं है
नेमिनाथ ने क्रोध में नहीं, करुणा में जीवन-त्याग किया। उनका विरक्तिपूर्ण निर्णय विद्रोह नहीं, प्रेम की उच्चतम अभिव्यक्ति था।
📿 मुख्य सार
भगवान नेमिनाथ की कथा हमें सिखाती है कि करुणा किसी भी परिस्थिति में जागृत हो सकती है: चाहे विवाह-मंडप हो या युद्धभूमि। उन्होंने अहिंसा को सिर्फ सिद्धांत नहीं, जीवन-मूल्य बनाया। और राजीमती ने दिखाया कि सच्चा प्रेम उसके पीछे चलता है जो आत्मा का सत्य हो: व्यक्ति का नहीं।
स्रोत एवं संदर्भ सूची
सभी तथ्य प्रमाणिक जैन शास्त्रों और विश्वसनीय संस्थानों पर आधारित हैं।
राजीमती के सत्यभामा से संबंध, कृष्ण की भूमिका और विवाह-प्रस्ताव।
पशु-करुणा और वैराग्य का कारण: अहिंसा-आधारित विस्तृत विश्लेषण।
हिंदी साहित्य में नेमिनाथ और राजमती की कथाओं का आगमिक आधार।
दिगंबर परंपरा में नेमिनाथ भगवान की उपासना और गिरनार मोक्ष-स्थल।

