भरत और बाहुबली
सत्ता के लिए युद्ध, और फिर सत्ता का त्याग, पहले तीर्थंकर के दो पुत्रों की अलौकिक कथा
जब संसार का पहला सम्राट बनने की चाह और एक भाई की स्वाभिमानी नकार आमने-सामने आई, तो उससे जो कथा जन्मी, वह जैन इतिहास की सबसे नाटकीय और सबसे प्रेरणादायक कथाओं में से एक है। भरत चक्रवर्ती और बाहुबली, दोनों ऋषभदेव के पुत्र, दोनों महान, फिर भी दोनों की नियति बिल्कुल अलग।
ऋषभदेव का वह ऐतिहासिक निर्णय
भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ), जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर, जब संन्यास लेने का निर्णय लिया तो उनके सामने एक विशाल साम्राज्य था।[१] उनकी पहली पत्नी सुमंगला के ९९ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े थे भरत। दूसरी पत्नी सुनंदा के एकमात्र पुत्र थे बाहुबली, जो अपने असाधारण शारीरिक बल के लिए प्रसिद्ध थे।[२]
ऋषभदेव ने अपना राज्य सभी १०० पुत्रों में बाँट दिया। भरत को अयोध्या (विनीता) मिली, बाहुबली को तक्षशिला (श्वेतांबर मत) या पोदनपुर (दिगंबर मत) मिली।[३] फिर ऋषभदेव वन की ओर चले गए।
भरत की विजय-यात्रा और चक्ररत्न का रुकना
भरत एक महत्वाकांक्षी और कुशल राजा थे। उन्होंने सभी दिशाओं में विजय-यात्रा (दिग्विजय) की और चक्रवर्ती बनने की ओर बढ़ते रहे।[४] उनके पास दिव्य चक्ररत्न था, एक ऐसा अस्त्र जो जिस भी राज्य में प्रवेश करे, वहाँ का राजा भरत की अधीनता स्वीकार कर ले।
अपनी विजय-यात्रा पूरी कर जब भरत अयोध्या लौट रहे थे, तो वह चक्ररत्न नगर के द्वार पर अपने आप रुक गया।[३] इसका अर्थ था कि उनके ९९ भाइयों में से अभी किसी ने उनकी अधीनता स्वीकार नहीं की। ९८ भाइयों ने शीघ्र ही संन्यास लेकर साम्राज्य-विवाद से मुक्ति पा ली। किंतु बाहुबली ने झुकने से मना कर दिया।[५]
भरत ने कहा: "तुम मेरे छोटे भाई हो, मेरी अधीनता स्वीकार करो।" बाहुबली ने उत्तर दिया: "तुम बड़े भाई हो, यह सत्य है। किंतु भूमि किसी की बपौती नहीं। जो पिता ने दिया, वह मेरा है।"
आदिपुराण के आधार पर, बाहुबली का उत्तर [२]
तीन युद्ध: आँख से आँख, पानी से पानी, मुट्ठी से मुट्ठी
दोनों की सेनाएँ युद्ध के मैदान में आ गईं। तभी मंत्रियों ने सुझाया कि दोनों राजाओं के बीच सीधा द्वंद्व हो, ताकि लाखों सैनिकों का रक्त न बहे।[५] तीन प्रकार के युद्ध तय हुए:
भरत चक्रवर्ती
प्रथम तीर्थंकर का ज्येष्ठ पुत्र, चक्रवर्ती सम्राट, दिव्य अस्त्रों के स्वामी
बाहुबली
असाधारण शारीरिक बल के स्वामी, वज्र ऋषभनाराच संहनन, अजेय योद्धा
वह क्षण जब राज्य जीतकर भी बाहुबली हार गए
तीनों द्वंद्व जीतने के बाद बाहुबली के पास अधिकार था कि वे भरत को पराजित घोषित करें और साम्राज्य ले लें।[५] किंतु उसी क्षण उनके मन में एक विचार आया: "मैं इस भूमि के लिए अपने बड़े भाई से लड़ रहा हूँ? यह नश्वर राज्य, जिसे पिता ने भी त्याग दिया? मैं किसके लिए यह सब कर रहा हूँ?"
बाहुबली ने उसी युद्धभूमि में अपने वस्त्र, आभूषण और राज्य सब कुछ त्याग दिया और केशलुंचन (बाल नोचकर) करते हुए दीक्षा ले ली।[३] वे नग्न और निर्द्वंद्व खड़े हो गए।
बारह वर्ष की ध्यान-साधना
बाहुबली एक वन में खड़े होकर कायोत्सर्ग (शरीर-त्याग मुद्रा) में तप करने लगे।[६] महीने बीते, वर्ष बीते। उनके पाँवों के पास चींटियों ने बाँबी बना ली। पाँवों पर बेलें चढ़ गईं। पक्षियों ने बालों में घोंसले बना लिए। किंतु बाहुबली टस से मस नहीं हुए।
बारह वर्ष बीत गए, फिर भी केवलज्ञान नहीं मिला। देवताओं को आश्चर्य हुआ। उन्होंने बाहुबली की बहनों ब्राह्मी और सुंदरी को भेजा। बहनों ने कहा: "भैया, हाथी से उतरो।"[५] बाहुबली चौंके। उनके मन में अभी भी एक सूक्ष्म अहंकार था कि "मैंने भरत को हराया था, मैं बड़े भाई के चरणों में क्यों जाऊँ?" वही हाथी का अहंकार था।
बहनों के शब्दों ने वह अंतिम दीवार तोड़ दी। बाहुबली ने उसी क्षण मन के उस अहंकार को छोड़ा। और केवलज्ञान का प्रकाश फूट पड़ा।
जैनपीडिया, बाहुबली का केवलज्ञान प्रसंग [५]
भरत का अंत: दर्पण और आत्म-जागृति
भरत चक्रवर्ती ने अखंड भारत पर राज्य किया। किंतु जीवन के अंतिम काल में एक दिन वे अपने आभूषण-गृह में थे।[४] तभी उनकी एक अंगुली की अँगूठी गिर गई और उस अँगूठी के बिना उनकी उँगली साधारण लग रही थी। उन्होंने सोचा: जब अँगूठी उतरते ही उँगली की शोभा चली जाती है, तो यह राज-वैभव, यह मुकुट, यह साम्राज्य जब छूटेगा तो मैं क्या रह जाऊँगा? उसी क्षण उन्हें वैराग्य हुआ और उन्होंने भी दीक्षा ले ली।[२]
- बाहुबली की स्मृति में ९८३ ई. में गोमतेश्वर प्रतिमा बनाई गई, श्रवणबेलगोला, कर्नाटक में[६]
- यह ५७ फीट ऊँची अखंड पत्थर की मूर्ति है, विश्व की सबसे बड़ी अखंड मूर्तियों में से एक[६]
- हर १२ वर्ष में महामस्तकाभिषेक महोत्सव होता है जिसमें लाखों श्रद्धालु आते हैं
- जैन दर्शन में बाहुबली पहले व्यक्ति माने जाते हैं जिन्होंने मोक्ष प्राप्त किया[७]
इस कथा से छह शाश्वत संदेश
जीत के बाद भी त्याग संभव है
बाहुबली तीनों युद्ध जीते, राज्य उनका था। फिर भी उन्होंने सब छोड़ दिया। असली विजय संसार पर नहीं, मन पर होती है।[५]
अहंकार ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु है
बारह वर्ष के तप के बाद भी केवलज्ञान न मिला क्योंकि एक सूक्ष्म अहंकार बाकी था। अहंकार छूटते ही ज्ञान आया।[३]
सत्ता की भूख का कोई अंत नहीं
भरत ने सारी दुनिया जीती, फिर भी एक भाई का न झुकना उन्हें खला। सत्ता की तृष्णा अनंत है।[४]
परिवार से बड़ा कोई बंधन नहीं
बाहुबली ने युद्ध में भरत को घायल होते देखा तो रोक लिया। शत्रु भी जब भाई हो, तो हृदय झुक जाता है।[५]
वैभव की असलियत एक पल में दिखती है
भरत को अँगूठी उतरते ही बोध हुआ। बड़े-बड़े सम्राटों को भी एक छोटी सी घटना जागृति दे सकती है।[२]
झुकना कमज़ोरी नहीं, महानता है
बाहुबली ने जब अहंकार छोड़ा और मन से भरत को प्रणाम किया, तभी मोक्ष मिला। नम्रता ही परम शक्ति है।[३]
स्रोत एवं संदर्भ सूची
इस लेख की सभी ऐतिहासिक और आगमिक जानकारी प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित है।
तीनों द्वंद्वों का विस्तृत विवरण, ब्राह्मी-सुंदरी प्रसंग, और कलासंबंधी संदर्भ।
ऋषभदेव की दो पत्नियाँ, राज्य-वितरण और भरत का दर्पण-प्रसंग।
बाहुबली का जीवन, चक्ररत्न प्रसंग, ध्यान और केवलज्ञान का विस्तृत विवरण।
गोमतेश्वर प्रतिमा का इतिहास, निर्माण काल और महामस्तकाभिषेक का विवरण।
बाहुबली की मध्यकालीन धातु प्रतिमा का विवरण, कर्नाटक, १५वीं-१७वीं शताब्दी।
भरत चक्रवर्ती का जीवन, दिग्विजय, चक्ररत्न और दर्पण-वैराग्य प्रसंग।

