1. मुक्तागिरि का ऐतिहासिक कालक्रम – 2500 वर्ष से वर्तमान तक
  1. लगभग 2500 वर्ष पूर्व – राजा श्रेणिक बिंबिसार का समय


जैन परंपरा के अनुसार, मुक्तागिरि के दसवें मंदिर अर्थात मेंढागिरि गुफा मंदिर का संबंध लगभग 2500 वर्ष पूर्व के समय से माना जाता है।
उस समय मगध के राजा श्रेणिक बिंबिसार का शासन था। वे भगवान महावीर के समकालीन माने जाते हैं।
मुक्तागिरि से जुड़ी एक पारंपरिक मान्यता के अनुसार, राजा श्रेणिक बिंबिसार ने इस पहाड़ी पर गुफा मंदिर का निर्माण करवाया था और यहां प्रतिमाएं स्थापित करवाई थीं।इस मान्यता के अनुसार, मुक्तागिरि का संबंध भगवान महावीर के समय से जुड़ता है।ऐतिहासिक स्पष्टीकरण: 2024 में प्रकाशित पुरातात्विक शोध के अनुसार, राजा बिंबिसार द्वारा मंदिर निर्माण की बात ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है। इसे तीर्थ की प्राचीन धार्मिक परंपरा और लोकमान्यता के रूप में प्रस्तुत करना उचित है। 

2. प्रारंभिक ईस्वी शताब्दियां – आचार्य कुंदकुंद और मेंढागिरि का उल्लेख

  मुक्तागिरि के इतिहास का एक महत्वपूर्ण लिखित संदर्भ आचार्य कुंदकुंद द्वारा रचित प्राकृत ग्रंथ निर्वाणकांड में मिलता है।
इस ग्रंथ के 16वें पद में मेंढागिरि का उल्लेख किया गया है।इस पद में अचलपुर के निकट स्थित मेंढागिरि पर्वत का वर्णन करते हुए साढ़े तीन करोड़ मुनिराजों को नमन किया गया है, जिन्होंने वहां से निर्वाण प्राप्त किया।इससे यह पता चलता है कि प्राचीन जैन परंपरा में मेंढागिरि को एक पवित्र सिद्धक्षेत्र के रूप में विशेष महत्व प्राप्त था।आचार्य कुंदकुंद का निश्चित समय विद्वानों में चर्चा का विषय है, लेकिन उन्हें सामान्यतः प्रारंभिक ईस्वी शताब्दियों से जोड़ा जाता है.


मुक्तागिरि का दूसरा प्रसिद्ध नाम मेंढागिरि है। इस नाम के पीछे एक धार्मिक कथा प्रचलित है।कहा जाता है कि लगभग 1000 वर्ष पूर्व एक मुनिराज झरने के पास ध्यान और तपस्या कर रहे थे। उसी समय एक मेंढा पहाड़ी से फिसलकर उनके पास गिर गया।मुनिराज ने उस जीव के कान में णमोकार मंत्र का उच्चारण किया। जैन मान्यता के अनुसार, उस जीव को देवगति प्राप्त हुई।इस घटना के बाद इस स्थान का नाम मेंढागिरि प्रसिद्ध हुआ।ध्यान दें कि यह धार्मिक परंपरा से जुड़ी कथा है, न कि किसी समकालीन ऐतिहासिक अभिलेख से प्रमाणित घटना। 


इस काल में मुक्तागिरि के मंदिरों और धार्मिक संरचनाओं का विकास हुआ।मुक्तागिरि के दसवें मंदिर को कई तीर्थ विवरणों में लगभग 10वीं शताब्दी का बताया गया है। हालांकि, 2024 के पुरातात्विक अध्ययन में गुफा मंदिर संख्या 10 की वास्तुशैली और निर्माण तकनीक के आधार पर यहां की शुरुआती स्थापत्य गतिविधियों को संभवतः 14वीं शताब्दी का माना गया है।इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसे पहाड़ की प्राकृतिक चट्टान को काटकर और पत्थरों से निर्माण करके तैयार किया गया है।इसमें चार स्तंभ, मेहराबदार प्रवेश द्वार और तीर्थंकर भगवान की अनेक प्रतिमाएं दिखाई देती हैं।मंदिर की दीवारों पर 72 जिन प्रतिमाएं अर्थात तीन चौबीसी अंकित हैं। 


मुक्तागिरि के 26वें मंदिर में विराजमान मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा इस तीर्थ की सबसे प्रसिद्ध प्रतिमाओं में से एक है।
यह लगभग चार फीट ऊंची काले पत्थर की पद्मासन प्रतिमा है, जिसके ऊपर सात सर्पफणों का छत्र बना हुआ है।
तीर्थ की परंपरा के अनुसार, राजा श्रीपाल को भगवान पार्श्वनाथ की यह प्रतिमा अचलपुर के निकट एक तालाब के पास प्राप्त हुई थी। बाद में इसे मुक्तागिरि में स्थापित करवाया गया।

इस प्रतिमा के साथ कई धार्मिक कथाएं जुड़ी हुई हैं।

इस समय से जुड़े प्रतिमा अभिलेख:

- विक्रम संवत 1546 (लगभग 1489 ईस्वी) की पार्श्वनाथ प्रतिमा का उल्लेख मिलता है
- विक्रम संवत 1548 (लगभग 1491 ईस्वी) की प्रतिमाओं का भी उल्लेख है।
- विक्रम संवत 1549 (लगभग 1492 ईस्वी) की प्रतिमाओं का उल्लेख तीर्थ विवरणों में मिलता है।
ये अभिलेख मुक्तागिरि में उस समय प्रतिमा स्थापना और धार्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।

6. 16वीं शताब्दी – राजा ऐल श्रीपाल और भट्टारकों का योगदान

इस काल में मुक्तागिरि एक महत्वपूर्ण जैन तीर्थ केंद्र के रूप में विकसित हुआ।

तीर्थ की परंपरा के अनुसार, एलिचपुर (वर्तमान अचलपुर) के राजा ऐल श्रीपाल ने लगभग 1000 वर्ष पूर्व इस क्षेत्र के विकास में योगदान दिया था। हालांकि, उनके शासनकाल की सटीक तिथि और योगदान का पूरा विवरण स्थापित नहीं है।
इस काल में जैन भट्टारकों ने भी धार्मिक गतिविधियों, प्रतिमा प्रतिष्ठाओं और मंदिरों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विशेष रूप से भट्टारक धर्मभूषण का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने विक्रम संवत 1575 (लगभग 1518 ईस्वी) में मुक्तागिरि की यात्रा की थी। इसी यात्रा के दौरान उन्होंने करंजा में बालात्कार गण की पीठ स्थापित की।
मुक्तागिरि का संबंध विदर्भ क्षेत्र के जैन धार्मिक केंद्रों और भट्टारक परंपराओं से मजबूत होता गया।

7. 17वीं शताब्दी – धार्मिक साहित्य में मुक्तागिरि का उल्लेख
इस समय मुक्तागिरि का धार्मिक महत्व लगातार बना रहा।
भट्टारक ज्ञानसागर, ब्रह्मचारी धवजी और कवि राघव जैसे धार्मिक विद्वानों के लेखन में मुक्तागिरि का उल्लेख मिलता है।
इससे पता चलता है कि मुक्तागिरि केवल स्थानीय श्रद्धालुओं तक सीमित नहीं था, बल्कि जैन धार्मिक साहित्य और साधना परंपरा में भी इसका स्थान था।

8. 19वीं शताब्दी – तीर्थ यात्रा और संरक्षण

लगभग 1819 ईस्वी में भट्टारक पद्मनंदी के मुक्तागिरि तीर्थ आने का उल्लेख मिलता है।
उनकी समाधि का संबंध निकटवर्ती खरपी गांव से बताया जाता है।
इससे पता चलता है कि 19वीं शताब्दी में भी मुक्तागिरि जैन साधु-संतों और श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ बना हुआ था।

9. 1876 ईस्वी – ऐतिहासिक विवरणों में उल्लेख
ब्रिटिश काल के इतिहासकार जेम्स फर्ग्यूसन ने 1876 में प्रकाशित अपने अध्ययन में मुक्तागिरि के प्राकृतिक और भौगोलिक परिवेश का उल्लेख किया।
यह मुक्तागिरि के बारे में आधुनिक ऐतिहासिक और स्थापत्य संबंधी लेखन के शुरुआती संदर्भों में से एक है।

10. 1907 ईस्वी – ब्रिटिश गजेटियर में मुक्तागिरि
आर. वी. रसेल ने 1907 में प्रकाशित Central Provinces District Gazetteers – Betul District में मुक्तागिरि का उल्लेख किया।
इसमें मुक्तागिरि को जैन धर्म के एक मध्यकालीन तीर्थ केंद्र के रूप में बताया गया और यहां के मंदिरों की स्थापत्य विशेषताओं का परिचय दिया गया।
इस दस्तावेज से मुक्तागिरि के उस समय के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व की जानकारी मिलती है।

11. 1923 ईस्वी – मंदिर क्षेत्र के संरक्षण की दिशा में कदम
मुक्तागिरि के संस्थान से जुड़े ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, 1923 में श्री नथूसाजी पासूसाजी कलमकर ने खापर्डे से सतपुड़ा पहाड़ी क्षेत्र खरीदा, जहां 52 जैन मंदिर स्थित थे।
इसके बाद उन्होंने पहाड़ी के नीचे धर्मशाला और महावीर मंदिर का निर्माण करवाया।
यह कदम तीर्थ के संरक्षण और यात्रियों की सुविधाओं के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाता है।

12. 1932 ईस्वी – मंदिरों के अभिलेखों का अध्ययन
इतिहासकार हीरालाल ने 1932 में प्रकाशित Inscriptions in the Central Provinces and Berar में मुक्तागिरि के कुछ अभिलेखों का उल्लेख किया।
इन अभिलेखों से मंदिरों और प्रतिमाओं के इतिहास को समझने में सहायता मिलती है।

13. 1956 ईस्वी – सार्वजनिक ट्रस्ट का गठन
1956 में मुक्तागिरि तीर्थ के प्रबंधन और व्यवस्था के लिए सार्वजनिक ट्रस्ट का गठन किया गया।
इसके बाद तीर्थ के मंदिरों, यात्रियों की सुविधाओं और धार्मिक गतिविधियों के संचालन को व्यवस्थित रूप देने की दिशा में कार्य किया गया।


14. 1980 के बाद – तीर्थ का पुनर्विकास और नई पहचान


1980 के बाद मुक्तागिरि तीर्थ के विकास और सुविधाओं में महत्वपूर्ण बदलाव आए।
इस समय आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के मुक्तागिरि में चातुर्मास का विशेष उल्लेख मिलता है।
उनके आगमन से इस तीर्थ की धार्मिक पहचान और अधिक व्यापक हुई तथा देशभर से श्रद्धालुओं का आगमन बढ़ा।
इसके बाद तीर्थ में दर्शन व्यवस्था, यात्रियों की सुविधाओं और मंदिर परिसर के रखरखाव पर ध्यान दिया गया।

15. 2000 से 2020 – आधुनिक सुविधाओं और तीर्थ संरक्षण का दौर 


21वीं शताब्दी में मुक्तागिरि देशभर के दिगंबर जैन श्रद्धालुओं के प्रमुख तीर्थ स्थलों में अपनी पहचान बनाए हुए है।
इस दौरान तीर्थ परिसर में यात्रियों के लिए सुविधाओं, मंदिरों के रखरखाव, दर्शन व्यवस्था और धार्मिक गतिविधियों को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया गया।
प्राकृतिक पहाड़ियों के बीच स्थित 52 जिनालयों की वंदना करने के लिए देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

16. 2024 ईस्वी – मुक्तागिरि पर आधुनिक पुरातात्विक शोध
2024 में शोधकर्ता ओशिन बाम्ब (Oshin Bamb) द्वारा Ancient Asia नामक शोध पत्रिका में मुक्तागिरि के दसवें मंदिर पर एक महत्वपूर्ण शोध प्रकाशित किया गया।
शोध का शीर्षक था:
A Unique Partially Rock-cut and Partially Structural Jain Cave Temple: Cave No. 10 at Muktagiri
इस शोध में निम्नलिखित विषयों का अध्ययन किया गया:
- दसवें मंदिर की वास्तुकला और निर्माण शैली।
- प्राकृतिक चट्टान को काटकर मंदिर बनाने की तकनीक।
- मंदिर में मौजूद जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं।
- 72 जिन प्रतिमाओं अर्थात तीन चौबीसी का महत्व।
- मंदिर की दीवारों पर मौजूद शिल्प और अभिलेख।
- मुक्तागिरि के मध्यकालीन धार्मिक और सांस्कृतिक विकास का इतिहास।
इस शोध के अनुसार, मुक्तागिरि में प्रारंभिक स्थापत्य गतिविधियों का समय संभवतः
14वीं शताब्दी माना जा सकता है।
यह शोध मुक्तागिरि के इतिहास को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण आधुनिक दस्तावेज है।

 

आज मुक्तागिरि मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में स्थित एक प्रसिद्ध दिगंबर जैन सिद्धक्षेत्र और अतिशय क्षेत्र है।
यहां कुल 52 जिनालय हैं, जो पहाड़ी पर अलग-अलग स्थानों पर स्थित हैं।
आज भी श्रद्धालु यहां आकर:

- 52 जिनालयों के दर्शन और वंदना करते हैं।
- भगवान पार्श्वनाथ के दर्शन करते हैं।
- प्राचीन मेंढागिरि गुफा मंदिर को देखते हैं।
- जैन धर्म की प्राचीन परंपराओं और मान्यताओं को समझते हैं।
- प्राकृतिक वातावरण में आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं।
मुक्तागिरि आज भी जैन धर्म की प्राचीन विरासत, तपस्या और मोक्षमार्ग की प्रेरणा देने वाला एक महत्वपूर्ण तीर्थ है।