
पालीताना
जैन तीर्थों का शिखर
३,७५० सीढ़ियाँ, ९०० से अधिक मंदिर, ९०० वर्षों का निर्माण शत्रुंजय पर्वत पर बसा यह तीर्थ केवल एक स्थान नहीं, एक संपूर्ण आध्यात्मिक ब्रह्मांड है।
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पालीताना गुजरात के भावनगर जिले में शत्रुंजय पर्वत पर बसा यह तीर्थ विश्व का एकमात्र ऐसा पर्वत है जिस पर ९०० से अधिक मंदिर हैं। इसे जैनों का "वेटिकन" कहा जाता है। यहाँ प्रत्येक पत्थर पवित्र है, प्रत्येक सीढ़ी एक प्रार्थना है और शिखर पर पहुँचना मोक्ष के एक कदम निकट जाना है।
शत्रुंजय का अर्थ है "आंतरिक शत्रुओं का विजेता।" यह पर्वत केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं यह उस आंतरिक युद्ध का प्रतीक है जो प्रत्येक साधक अपनी कषायों के विरुद्ध लड़ता है। जब आप ३,७५० सीढ़ियाँ चढ़ते हैं, तो यह यात्रा आपके भीतर भी होती है शरीर की थकान के साथ-साथ मन की ग्रंथियाँ भी शिथिल होती जाती हैं।
पालीताना और शत्रुंजय पर्वत के मंदिरों का प्रबंधन आनंदजी कल्याणजी ट्रस्ट करता है जो श्वेताम्बर जैन परंपरा का सबसे प्रमुख तीर्थ-प्रबंधन न्यास है। यह ट्रस्ट १७३० से इस पवित्र स्थान की देखरेख कर रहा है।
"शत्रुंजय माहात्म्य के अनुसार भगवान आदिनाथ (ऋषभनाथ) ने यहाँ अपना प्रथम उपदेश दिया था। उनके प्रथम शिष्य पुण्डरीक स्वामी ने इसी पर्वत पर निर्वाण प्राप्त किया, इसलिए इसका मूल नाम 'पुण्डरीकगिरि' था। २४ में से २३ तीर्थंकरों ने इस पर्वत को अपनी उपस्थिति से पावन किया। भगवान आदिनाथ ने तो इस पर्वत की ७०० करोड़ से अधिक बार यात्रा की किसी भी अन्य जैन तीर्थ से कहीं अधिक।"
शत्रुंजय माहात्म्य, धनेश्वर रचित (१४वीं शताब्दी) पर आधारित
इतिहास ९०० वर्षों की श्रद्धा की यात्रा
पालीताना के मंदिरों का निर्माण ११वीं शताब्दी से आरंभ हुआ। सर्वप्रथम सोलंकी वंश के महान जैन राजा कुमारपाल ने यहाँ मंदिर बनवाए। इसके बाद पीढ़ी-दर-पीढ़ी जैन व्यापारियों, राजाओं और श्रेष्ठियों ने अपनी श्रद्धा और संपत्ति इस पर्वत को समर्पित की।
१३११ ईस्वी में तुर्क आक्रांताओं ने शत्रुंजय के मंदिरों को क्षति पहुँचाई। परंतु जैन समाज की अद्भुत प्रतिक्रिया थी बदले की नहीं, पुनर्निर्माण की। मात्र दो वर्षों में पुनर्निर्माण आरंभ हो गया। १६५६ में मुगल सूबेदार ने पालीताना की अभिरक्षा जैन व्यापारी शांतिदास झवेरी को सौंपी धार्मिक सहिष्णुता का एक दुर्लभ उदाहरण।
आज जो मंदिर दिखते हैं उनमें से अधिकांश १६वीं से १९वीं शताब्दी के हैं। १९वीं शताब्दी में सबसे अधिक निर्माण-गतिविधि हुई। इस पर्वत का सोलह बार जीर्णोद्धार हुआ है प्रत्येक बार जैन समाज ने और अधिक भव्यता से इसे पुनर्जीवित किया।
यात्रा ३,७५० सीढ़ियों का आध्यात्मिक आरोहण
शत्रुंजय पर्वत की चढ़ाई ३,७५० पत्थर की सीढ़ियों से होती है ३.५ किलोमीटर की यह यात्रा लगभग डेढ़ से दो घंटे की है। यह केवल शारीरिक चढ़ाई नहीं यह एक आंतरिक रूपांतरण है।
यात्रा यहाँ से आरंभ होती है। जय तलेटी मंदिर में दर्शन करके श्रद्धालु पर्वत की मिट्टी माथे पर लगाते हैं। जो शिखर तक नहीं जा सकते, उनके लिए यहाँ एक लघु-शत्रुंजय है।
पर्वत के मध्य में यह सुंदर नक्काशीदार मंदिर है। यहाँ विश्राम करते हुए श्रद्धालु आगे की चढ़ाई के लिए ऊर्जा संचित करते हैं।
यहाँ से शत्रुंजय की असली मंदिर-नगरी आरंभ होती है। बाईं ओर अंगार पीर की दरगाह है एक मुस्लिम संत जिन्होंने मुगल आक्रमण से मंदिरों की रक्षा की।
नौ विशाल परिसरों में सैकड़ों मंदिर प्रत्येक टूंक एक केंद्रीय मंदिर और उसके चारों ओर छोटे मंदिरों का समूह है।
पर्वत के सर्वोच्च शिखर पर भगवान आदिनाथ (ऋषभनाथ) का भव्य मुख्य मंदिर है। यहाँ पहुँचना हर जैन के जीवन का सर्वोच्च क्षण है।
नौ टूंक मंदिरों के नौ आकाश
शत्रुंजय पर्वत के मंदिर नौ प्रमुख परिसरों में विभाजित हैं जिन्हें टूंक कहते हैं। प्रत्येक टूंक में एक केंद्रीय मंदिर और उसके आसपास छोटे-बड़े मंदिरों का समूह होता है।
सबसे पुराने और भव्य टूंकों में से एक। खरतर गच्छ के श्रावकों द्वारा निर्मित।
१६१८ में एक जैन व्यापारी द्वारा निर्मित। चारों दिशाओं में आदिनाथ की चतुर्मुखी मूर्ति।
सोलंकी राजा कुमारपाल द्वारा निर्मित जैन राजाओं की भक्ति का सर्वोत्तम प्रमाण।
माउंट आबू के दिलवाड़ा मंदिर के निर्माता विमलशाह की स्मृति में अलंकृत संगमरमर नक्काशी।
सम्राट अशोक के पौत्र सांप्रति राजा जो जैन धर्म के महान संरक्षक थे को समर्पित।
मोतीशाह टूंक, आदीश्वर टूंक, बलभद्र टूंक सहित अन्य प्रत्येक अपनी विशिष्ट स्थापत्य-शैली के साथ।


रोचक तथ्य जो आप नहीं जानते होंगे
- रात्रि-वास निषिद्ध: पर्वत पर सूर्यास्त के बाद कोई भी नहीं रुक सकता न यात्री, न पुजारी, न साधु। यह मंदिर इतना पवित्र है कि इसे केवल दिव्य अस्तित्वों के लिए रखा गया है।
- विश्व का प्रथम शाकाहारी शहर: २०१४ में पालीताना विश्व का पहला कानूनी रूप से शाकाहारी शहर बना। यहाँ माँस, मछली और अंडे की बिक्री पूर्णतः प्रतिबंधित है।
- पालकी की सेवा: जो श्रद्धालु चढ़ नहीं सकते, उनके लिए पालकी (डोली) की व्यवस्था है यह परंपरा सदियों पुरानी है।
- मुस्लिम संरक्षक: नव टूंक द्वार के पास अंगार पीर की दरगाह है एक मुस्लिम संत जिन्होंने मंदिरों को मुगल आक्रमण से बचाया। जैन-मुस्लिम सद्भाव का अद्भुत उदाहरण।
- षट्गाँव परिक्रमा: फाल्गुन पूर्णिमा पर हजारों श्रद्धालु २१.६ किमी की पैदल परिक्रमा करते हैं। यह छागौ-तीर्थयात्रा कहलाती है।
- १६ जीर्णोद्धार: शत्रुंजय का इतिहास में सोलह बार जीर्णोद्धार हुआ है हर बार हिंसा के बाद जैन समाज ने निर्माण से उत्तर दिया।
तीर्थ यात्री के लिए व्यावहारिक जानकारी
पालीताना की यात्रा केवल एक तीर्थ-दर्शन नहीं यह एक रूपांतरण है। जब आप ३,७५० सीढ़ियाँ चढ़कर शिखर पर खड़े होते हैं और चारों ओर संगमरमर के मंदिरों की आकाशगंगा देखते हैं, तो समझ में आता है यह स्थान मनुष्य ने नहीं, श्रद्धा ने बनाया है।
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स्रोत एवं संदर्भ सूची
इस लेख की सभी ऐतिहासिक, वास्तु-संबंधी और तीर्थ-संबंधी जानकारी प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित है।
१४वीं शताब्दी का संस्कृत ग्रंथ जो शत्रुंजय के मिथ-इतिहास, भगवान आदिनाथ के संबंध और तीर्थ की महिमा का विस्तृत वर्णन करता है।
इतिहास, वास्तु-आँकड़े, आक्रमण-इतिहास और धार्मिक महत्व के तथ्यों के प्राथमिक क्रॉस-वेरिफिकेशन के लिए।
गुजरात पर्यटन विभाग का आधिकारिक विवरण। चौमुखजी टूंक, यात्रा-मार्ग और तीर्थ-इतिहास के लिए संदर्भित।
Routledge, २०००। शत्रुंजय को श्वेताम्बर पंचतीर्थ में स्थान और जैन तीर्थ-परंपरा के संदर्भ में।
आनंदजी कल्याणजी ट्रस्ट, मंदिर-नगरी का विकास-इतिहास और शत्रुंजय पट के लिए विस्तृत अकादमिक स्रोत।
षट्गाँव परिक्रमा, १६ जीर्णोद्धार का विवरण, टूंक-व्यवस्था और तीर्थ की विशिष्टताओं के लिए संदर्भित।
जय जिनेन्द्र 🙏

