पर्युषण पर्व | जैन महापर्व | JAINKART

जैन ज्ञान श्रृंखला · JAINKART

पर्युषण पर्व
जैन धर्म का सबसे पवित्र उत्सव

पर्युषण केवल एक त्योहार नहीं है। यह आत्मा की वार्षिक महासफाई है। यह वह समय है जब जैन समाज सांसारिक व्यस्तताओं से हटकर साधना, उपवास, स्वाध्याय और क्षमा में डूब जाता है। श्वेतांबर इसे आठ दिन और दिगंबर दस दिन मनाते हैं।

🌸 जैन महापर्व 📖 8 और 10 दिन 🙏 संवत्सरी क्षमापाठ ⚖️ दशलक्षण धर्म 🕉 भाद्रपद मास

पर्युषण शब्द का अर्थ है "आत्मा के पास बस जाना।" यह वह पर्व है जब जैन श्रद्धालु बाहर की दुनिया से थोड़ा पीछे हटकर अपनी आत्मा के पास लौटते हैं। उपवास, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय और क्षमायाचना, इन चार स्तंभों पर पर्युषण खड़ा है। यह पर्व भाद्रपद मास में आता है और समस्त जैन समाज इसे सर्वोच्च धार्मिक उत्सव मानता है।

"पर्युषण वह समय है जब हम अपनी आत्मा का लेखा-जोखा करते हैं। पूरे वर्ष में जाने-अनजाने जो पाप हुए, जो हिंसा हुई, जो असत्य बोला गया, उन सबका प्रायश्चित्त करने का यही अवसर है।"

जैन पर्युषण परंपरा
8 दिनश्वेतांबर पर्युषण
10 दिनदिगंबर दशलक्षण
संवत्सरीअंतिम दिन क्षमापाठ
भाद्रपदपर्व का मास

पर्युषण का अर्थ और महत्व

पर्युषण संस्कृत के दो शब्दों से बना है। परि यानी चारों ओर से और उषण यानी बस जाना। अर्थात आत्मा के पास पूरी तरह बस जाना, संसार से ध्यान हटाकर भीतर की ओर मुड़ना।

यह पर्व जैन धर्म का सर्वोच्च धार्मिक पर्व है। इन दिनों जैन श्रद्धालु यथासंभव उपवास करते हैं, प्रतिक्रमण करते हैं, कल्पसूत्र या अन्य शास्त्रों का स्वाध्याय करते हैं और अंत में संवत्सरी पर समस्त जीवों से क्षमा माँगते हैं।

जैन मान्यता के अनुसार इन दिनों की गई साधना का फल अन्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक होता है।

श्वेतांबर पर्युषण, आठ दिन

श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण भाद्रपद शुक्ल पंचमी से द्वादशी तक आठ दिन मनाया जाता है। इन आठ दिनों में कल्पसूत्र का वाचन होता है।

पहला दिन प्रथम दिवस पर्युषण आरंभ, उपवास संकल्प
दूसरा दिन कल्पसूत्र वाचन महावीर जीवन की कथा
तीसरा दिन श्रुत पंचमी शास्त्र ज्ञान का सम्मान
चौथा दिन दोहद पूर्ण महावीर माँ का स्वप्न
पाँचवाँ दिन जन्म कल्याणक महावीर जन्म उत्सव
छठा दिन तप और साधना विशेष उपवास, प्रतिक्रमण
सातवाँ दिन प्रतिक्रमण दिवस वार्षिक देवसी प्रतिक्रमण
आठवाँ दिन संवत्सरी खमेमि सव्वे जीवे · मिच्छामि दुक्कड़म

दिगंबर दशलक्षण, दस दिन

दिगंबर परंपरा में इसे दशलक्षण पर्व कहते हैं। यह भाद्रपद शुक्ल पंचमी से चतुर्दशी तक दस दिन चलता है। प्रत्येक दिन धर्म के एक लक्षण को समर्पित होता है।

1
उत्तम क्षमा क्रोध का पूर्ण त्याग
2
उत्तम मार्दव अहंकार का त्याग
3
उत्तम आर्जव सरलता और ईमानदारी
4
उत्तम शौच लोभ का त्याग
5
उत्तम सत्य पूर्ण सत्य का पालन
6
उत्तम संयम इंद्रिय संयम
7
उत्तम तप कठोर तपस्या
8
उत्तम त्याग दान और विसर्जन
9
उत्तम आकिंचन्य अपरिग्रह भाव
10
उत्तम ब्रह्मचर्य पूर्ण ब्रह्मचर्य
⚖️

दशलक्षण के ये दस गुण वास्तव में जैन धर्म के उस आदर्श चरित्र की रूपरेखा हैं जो एक साधु में होने चाहिए। इन दस दिनों में श्रद्धालु इन गुणों पर मनन करते हैं और जीवन में उतारने का संकल्प लेते हैं।

तत्त्वार्थ सूत्र, धर्म के दस लक्षण

पर्युषण की चार मुख्य साधनाएँ

पहली साधना

उपवास और तप

पर्युषण में उपवास को सर्वोच्च तप माना जाता है। अट्ठम यानी तीन दिन का उपवास, मासखमण यानी महीने भर का उपवास जैसी तपस्याएँ इन्हीं दिनों की जाती हैं। उपवास से शरीर और आत्मा दोनों शुद्ध होते हैं।

दूसरी साधना

प्रतिक्रमण

प्रतिक्रमण यानी अपने पापों की ओर पलटकर देखना और उनसे पश्चाताप करना। पर्युषण में विशेष संवत्सरी प्रतिक्रमण होता है जिसमें पूरे वर्ष के पापों का प्रायश्चित्त किया जाता है।

तीसरी साधना

स्वाध्याय

इन दिनों कल्पसूत्र, उत्तराध्ययन सूत्र और अन्य आगमों का वाचन और श्रवण होता है। ज्ञान की उपासना को जैन धर्म में तप के समकक्ष माना गया है।

चौथी साधना

क्षमायाचना

संवत्सरी के दिन खमेमि सव्वे जीवे बोलकर समस्त जीवों से क्षमा माँगी जाती है। लोग एक-दूसरे को मिच्छामि दुक्कड़म कहते हैं। यह जैन धर्म की सबसे सुंदर परंपरा है।

🌸 संवत्सरी, पर्युषण का हृदय

संवत्सरी पर्युषण का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन श्वेतांबर जैन समाज में सामूहिक संवत्सरी प्रतिक्रमण होता है। सभी जैन मंदिरों और उपाश्रयों में यह प्रतिक्रमण साथ मिलकर किया जाता है।

इस दिन लोग अपने सभी परिचितों, मित्रों, रिश्तेदारों और यहाँ तक कि शत्रुओं को भी मिच्छामि दुक्कड़म भेजते हैं। यह संदेश कहता है, "मेरे किसी कार्य से यदि आपको कष्ट हुआ हो तो वह मिथ्या हो जाए।"

दिगंबर परंपरा में इसे क्षमावाणी कहते हैं और यह दशलक्षण के अगले दिन यानी भाद्रपद पूर्णिमा को मनाया जाता है।

श्वेतांबर और दिगंबर पर्युषण में अंतर

✦ श्वेतांबर पर्युषण

  • अवधि आठ दिन, भाद्रपद शुक्ल पंचमी से
  • कल्पसूत्र का वाचन और श्रवण
  • महावीर जन्म कल्याणक विशेष
  • अंतिम दिन संवत्सरी प्रतिक्रमण
  • मिच्छामि दुक्कड़म की परंपरा

› दिगंबर दशलक्षण

  • अवधि दस दिन, धर्म के दस लक्षण
  • तत्त्वार्थ सूत्र का स्वाध्याय
  • प्रत्येक दिन एक गुण पर ध्यान
  • भाद्रपद पूर्णिमा को क्षमावाणी
  • अनंत चतुर्दशी पर समापन

📿 पर्युषण का सार

पर्युषण हमें याद दिलाता है कि जीवन की भागदौड़ में हम अपनी आत्मा को भूल जाते हैं। ये कुछ दिन उस आत्मा के लिए हैं। उपवास से शरीर शुद्ध होता है, प्रतिक्रमण से मन शुद्ध होता है, स्वाध्याय से बुद्धि शुद्ध होती है और क्षमायाचना से संबंध शुद्ध होते हैं। जो इन चारों साधनाओं को सच्चे मन से करता है, उसके लिए पर्युषण केवल एक त्योहार नहीं, एक आध्यात्मिक पुनर्जन्म बन जाता है।

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जय जिनेंद्र 🙏

स्रोत और संदर्भ

इस विषय के आगमिक और शैक्षणिक स्रोत
Primary Scriptureकल्पसूत्र, HereNow4U

पर्युषण परंपरा और संवत्सरी का मूल आगमिक स्रोत

Academic ReferenceThe Jains, Paul Dundas

श्वेतांबर और दिगंबर पर्युषण परंपरा का तुलनात्मक विवरण

Jain HeritageJain World, jainworld.com

दशलक्षण पर्व और क्षमावाणी की परंपरा

Festival ReferenceParyushana, HereNow4U

पर्युषण साधनाएँ, प्रतिक्रमण और उपवास विधि