धरोहर BY JAINKART · Jain Festival
पर्युषण पर्व
जैन धर्म का सर्वोच्च महापर्व
वर्ष का वह पवित्रतम काल जब जैन श्रद्धालु उपवास, स्वाध्याय, ध्यान और क्षमा की साधना में डूब जाते हैं। श्वेतांबर परंपरा में 8 दिन और दिगंबर परंपरा में 10 दिन का यह महापर्व आत्मशुद्धि, क्षमावाणी और मोक्ष-मार्ग का सर्वोच्च उत्सव है।
पर्युषण पर्व अर्थात आत्मा के पास लौटने का समय। यह केवल एक त्योहार नहीं, यह जैन धर्म का सबसे पवित्र आध्यात्मिक अनुष्ठान है जिसमें समस्त जैन समाज एक साथ उपवास, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण, क्षमायाचना और भगवान महावीर के जीवन के पुनर्स्मरण में संलग्न होता है। यह वह काल है जब मनुष्य अपने कर्मों का लेखा करता है और समस्त प्राणियों से क्षमा माँगता है।
"पर्युषण का अर्थ है — आत्मा के समीप बसना। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि इस जन्म में हमने जो भी अपराध किए हैं, चाहे जाने में हों या अनजाने में, हम उनसे मुक्त हो सकते हैं यदि हम सच्चे हृदय से क्षमा माँगें और दें।"
जैन आगम परंपरा — आवश्यक सूत्र के आधार परपर्युषण पर्व क्या है, अर्थ, नाम और परिचय
पर्युषण शब्द प्राकृत के "परि + उषण" से बना है। परि अर्थात सभी ओर से और उषण अर्थात जलाना अर्थात कर्मों को सभी ओर से जलाने का पर्व। एक अन्य व्युत्पत्ति के अनुसार इसका अर्थ है "आत्मा के समीप निवास करना।"
यह पर्व भाद्रपद मास में आता है जो हिंदी कैलेंडर के अनुसार अगस्त-सितंबर में पड़ता है। चातुर्मास के तीसरे-चौथे महीने में यह पर्व आता है जब साधु-साध्वी एक स्थान पर ठहरते हैं।
कल्प सूत्र (Kalpa Sutra by Bhadrabahu Swami) जो श्वेतांबर परंपरा का मूलभूत ग्रंथ है, के अनुसार भगवान महावीर ने स्वयं पर्युषण के नियम स्थापित किए। यह पर्व चारों संप्रदायों में मनाया जाता है।
पर्युषण के दौरान जैन श्रद्धालु अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के पाँचों महाव्रतों का यथासंभव पालन करते हैं।

श्वेतांबर पर्युषण — 8 दिन का दिव्य अनुष्ठान
श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण 8 दिनों का होता है जिसे "पर्युषण महापर्व" कहते हैं। इन 8 दिनों में कल्प सूत्र का पाठ सबसे केंद्रीय कार्यक्रम है। भाद्रपद शुक्ल पंचमी को आरंभ होकर यह भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को संवत्सरी के रूप में समाप्त होता है।
कल्प सूत्र पाठ का आरंभ
भगवान महावीर के जीवन की गाथा का पाठ प्रारंभ। साधु-साध्वी और श्रावक-श्राविका एकत्र होते हैं।
महावीर के माता-पिता की कथा
राजा सिद्धार्थ और माता त्रिशला की गाथा। त्रिशला माता के 14 स्वप्नों का पाठ।
महावीर जन्म कल्याणक कथा
भगवान महावीर के जन्म का उत्सव। इंद्र द्वारा स्नात्र पूजा और जन्मोत्सव का पाठ।
दीक्षा और तपस्या
30 वर्ष की आयु में महावीर का गृहत्याग। साढ़े बारह वर्षों की कठोर साधना का पाठ।
केवलज्ञान प्राप्ति
ऋजुवालिका नदी के तट पर महावीर को सर्वज्ञता की प्राप्ति। देव-दानवों द्वारा उत्सव।
धर्म प्रचार और उपदेश
महावीर के 30 वर्षों के धर्म-प्रचार की कथा। चंदनबाला की भावभरी गाथा।
निर्वाण कल्याणक
पावापुरी में महावीर का निर्वाण। उनकी अंतिम शिक्षाओं का पाठ। उपवास और ध्यान।
संवत्सरी — क्षमावाणी का दिन
पर्युषण का सर्वोच्च दिन। वार्षिक प्रतिक्रमण और "मिच्छामि दुक्कड़म" की क्षमायाचना।
दिगंबर दस लक्षण पर्व — 10 दिन, 10 धर्म

दिगंबर परंपरा में इसी काल को "दस लक्षण पर्व" (Dasha Lakshana Parva) कहते हैं। यह 10 दिनों का होता है और तत्त्वार्थ सूत्र के अध्याय 9 में वर्णित दस उत्तम धर्मों पर आधारित है।
प्रत्येक दिन एक उत्तम धर्म की साधना होती है। उत्तम क्षमा से आरंभ होकर उत्तम ब्रह्मचर्य पर समाप्त होता है। प्रत्येक दिन उस धर्म से संबंधित तत्त्वार्थ सूत्र के श्लोकों का पाठ और प्रवचन होता है।
दसवें दिन क्षमावाणी (जिसे दिगंबर परंपरा में "उत्तम क्षमा दिवस" भी कहते हैं) पर श्रद्धालु एक-दूसरे से हाथ जोड़कर क्षमा माँगते हैं और "जय जिनेंद्र" कहते हैं।
उत्तम क्षमा
दिन १ — क्रोध पर विजय पाकर सर्वोच्च क्षमा की साधना। सभी जीवों से मन, वचन, काय से क्षमायाचना।
उत्तम मार्दव
दिन २ — अहंकार का नाश और विनम्रता की साधना। श्रेष्ठता के भाव का त्याग।
उत्तम आर्जव
दिन ३ — मन, वचन, काय की एकरूपता। सरलता और कपटहीनता की साधना।
उत्तम शौच
दिन ४ — लोभ का नाश। संतोष और आत्मतोष की साधना। परिग्रह का त्याग।
उत्तम सत्य
दिन ५ — केवल वही बोलना जो हितकारी, सत्य और मधुर हो।
उत्तम संयम
दिन ६ — इंद्रियों और मन पर विजय। आत्म-नियंत्रण की उच्चतम साधना।
उत्तम तप
दिन ७ — कर्म निर्जरा के लिए बाह्य और अंतर तप की साधना। उपवास और ध्यान।
उत्तम त्याग
दिन ८ — निस्वार्थ दान और ममत्व का त्याग। सेवा और परोपकार की भावना।
उत्तम आकिंचन्य
दिन ९ — सभी वस्तुओं से अनासक्ति। "मेरा कुछ नहीं है" की भावना।
उत्तम ब्रह्मचर्य
दिन १० — दस लक्षणों का शिखर। मन-वचन-काय से ब्रह्मचर्य पालन।
संवत्सरी — क्षमावाणी का महान दिवस
मिच्छामि दुक्कड़म — यह प्राकृत के दो शब्दों से बना है। मिच्छामि अर्थात "मैं चाहता हूँ कि" और दुक्कड़म अर्थात "मेरे बुरे कर्म निष्फल हों।" इस प्रकार इसका पूरा अर्थ है: "मेरे द्वारा जाने-अनजाने में किए गए सभी दुष्कर्म निरर्थक हों और आप मुझे क्षमा करें।" यह शब्द आवश्यक सूत्र की परंपरा से आया है।
आवश्यक सूत्र, श्वेतांबर आगम परंपरासंवत्सरी पर्युषण का अंतिम और सर्वोच्च दिन है। इस दिन वार्षिक प्रतिक्रमण (Samvatsari Pratikraman) किया जाता है जो वर्ष भर में हुए पापों का प्रायश्चित है। यह प्रतिक्रमण आम दिनों के देवसी और रात्रि प्रतिक्रमण से बड़ा होता है।
इस दिन श्रद्धालु केवल अपने परिजनों से ही नहीं, बल्कि समस्त जगत के जीवों से क्षमा माँगते हैं। आवश्यक सूत्र का पाठ "खमेमि सव्वे जीवे" (मैं समस्त जीवों को क्षमा करता हूँ) इस भावना को व्यक्त करता है।
📿 उपवास और तप — आत्मशुद्धि का मार्ग
पर्युषण के दौरान उपवास जैन साधना का केंद्र है। साधारण एकासना (दिन में एक बार भोजन) से लेकर अट्ठम (8 दिन का उपवास) तक अनेक स्तरों पर तप किया जाता है।
आयंबिल (बिना घी-दूध-तेल के एक बार भोजन) और उपवास (पूर्ण उपवास, केवल जल) सबसे अधिक प्रचलित हैं। दसावैकालिक सूत्र के अनुसार तप के बिना कर्म-निर्जरा संभव नहीं।
उपवास केवल शरीर का नहीं, मन का भी उपवास होता है। क्रोध, मान, माया और लोभ — इन चार कषायों का त्याग ही वास्तविक उपवास है। पर्युषण में हरी सब्जियाँ, कंदमूल और जमीन से उखड़ी वस्तुएँ वर्जित मानी जाती हैं।
चारों संप्रदायों में पर्युषण
⚪ श्वेतांबर और स्थानकवासी
- 8 दिन का पर्युषण महापर्व, भाद्रपद शुक्ल में
- कल्प सूत्र पाठ — साधु-साध्वी द्वारा सार्वजनिक
- महावीर जन्म कल्याणक का उत्सव
- संवत्सरी प्रतिक्रमण — वार्षिक पाप-प्रायश्चित
- मिच्छामि दुक्कड़म — क्षमायाचना का सूत्र
- स्थानकवासी में उपाश्रय में पाठ, मूर्ति-पूजा नहीं
🟡 दिगंबर और तेरापंथी
- 10 दिन का दस लक्षण पर्व
- प्रतिदिन एक उत्तम धर्म की साधना
- तत्त्वार्थ सूत्र अध्याय 9 के श्लोकों का पाठ
- क्षमावाणी — दसवें दिन "उत्तम क्षमा"
- तेरापंथ में प्रेक्षा ध्यान का विशेष अभ्यास
- सभी में अहिंसा, उपवास और स्वाध्याय समान
पर्युषण का आगमिक आधार
पर्युषण की परंपरा का आगमिक आधार आवश्यक सूत्र में है जो छह आवश्यक कर्तव्यों का वर्णन करता है: सामायिक, चतुर्विंशति स्तव, वंदना, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग और प्रत्याख्यान। पर्युषण इन छहों का सघन अभ्यास-काल है।
दसावैकालिक सूत्र के अनुसार चातुर्मास में साधु-साध्वी का एक स्थान पर ठहरना अहिंसा का पालन है, क्योंकि वर्षा-काल में पृथ्वी पर असंख्य सूक्ष्म जीव उत्पन्न होते हैं और विहार करने से वे कुचले जाते हैं।
कल्प सूत्र में भगवान महावीर के जीवन का विस्तृत वर्णन है। यह ग्रंथ बादरायण स्वामी द्वारा रचित माना जाता है और इसे श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण का मूल आधार ग्रंथ माना जाता है।

पर्युषण काल में जैन श्रद्धालु तीर्थयात्रा, उपवास, प्रतिक्रमण और मंदिर-दर्शन में अपना समय अर्पित करते हैं।
पर्युषण की आध्यात्मिक यात्रा, ऐतिहासिक क्रम
महावीर द्वारा पर्युषण की परंपरा
भगवान महावीर ने चातुर्मास और आत्म-साधना की परंपरा स्थापित की। आवश्यक सूत्र में इसका विस्तृत वर्णन।
आगमों में पर्युषण का उल्लेख
दसावैकालिक सूत्र, कल्प सूत्र और आवश्यक सूत्र में चातुर्मास एवं पर्युषण के नियमों का संकलन।
श्वेतांबर-दिगंबर विभाजन के बाद
श्वेतांबर परंपरा में 8 दिवसीय पर्युषण महापर्व और दिगंबर परंपरा में 10 दिवसीय दस लक्षण पर्व की परंपरा स्थायी हुई।
वैश्विक स्तर पर पर्युषण
भारत के साथ-साथ विश्व भर के जैन समुदाय — USA, UK, अफ्रीका, पूर्वी एशिया में पर्युषण का भव्य आयोजन।
पर्युषण में क्या करें, श्रावक-श्राविका के लिए मार्गदर्शन
स्वाध्याय
कल्प सूत्र, तत्त्वार्थ सूत्र या उत्तराध्ययन सूत्र का दैनिक पाठ। श्वेतांबर में कल्प सूत्र का मंदिर में सार्वजनिक वाचन।
सामायिक
प्रतिदिन कम से कम एक सामायिक (48 मिनट का ध्यान)। मन को बाहरी विचारों से मुक्त कर आत्मा पर केंद्रित करना।
आहार संयम
हरी सब्जियाँ, कंदमूल, बहु-बीजी फल का त्याग। एकासना, आयंबिल या उपवास का पालन। रात्रि भोजन वर्जित।
प्रतिक्रमण
प्रातःकाल और सायंकाल देवसी-रात्रि प्रतिक्रमण। संवत्सरी पर वार्षिक प्रतिक्रमण। कायोत्सर्ग।
दान
साधर्मी भक्ति (साधु-साध्वी की सेवा) और ज्ञानदान। अन्नदान, ज्ञानदान, अभयदान और औषधदान।
मन-वचन-काय
क्रोध, मान, माया, लोभ से बचना। कटु वचन न बोलें। सोशल मीडिया और मनोरंजन से दूरी।
📿 पर्युषण का सार
पर्युषण केवल उपवास और पूजा का पर्व नहीं है — यह आत्मा के पुनर्मिलन का उत्सव है। जब हम "मिच्छामि दुक्कड़म" कहते हैं, तब हम न केवल दूसरों से, बल्कि अपनी ही आत्मा से क्षमा माँगते हैं उन सभी कर्मों के लिए जो हमने जाने-अनजाने किए। यही जैन धर्म की अहिंसा की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।
स्रोत और संदर्भ
तथ्य और जानकारी के प्रमुख आगमिक एवं शैक्षणिक स्रोतकल्प सूत्र का डिजिटल संस्करण, महावीर जीवन और पर्युषण परंपरा का मूल स्रोत
दस लक्षणों का स्रोत — तत्त्वार्थ सूत्र अध्याय 9 — सर्वमान्य जैन दार्शनिक ग्रंथ
पर्युषण, कल्प सूत्र और चारों संप्रदायों की परंपराओं का सर्वोत्तम अकादमिक विवरण
प्रतिक्रमण विधि, उपवास के प्रकार, पर्युषण कार्यक्रम और आवश्यक सूत्र

