धरोहर BY JAINKART · Jain Mandir
सम्मेद शिखरजी
जैन धर्म की सर्वोच्च मोक्ष-भूमि
झारखंड की पहाड़ियों में बसा वह परम पवित्र तीर्थ जहाँ 20 तीर्थंकरों ने कर्म के बंधन तोड़े, जहाँ 31 टोंकों में उन मुक्त आत्माओं के चरण-चिह्न आज भी श्रद्धालुओं को मोक्ष-मार्ग की याद दिलाते हैं।
सम्मेद शिखरजी — यह नाम लेते ही जैन श्रद्धालु के मन में एक विशेष कंपन उत्पन्न होता है। यह केवल एक पर्वत नहीं, जैन परंपरा की सबसे पवित्र स्मृति का भूगोल है। यहाँ की मिट्टी, यहाँ का मौन और यहाँ की हवा — सब मिलकर उस अनुभव की ओर ले जाते हैं जिसे जैन धर्म में मोक्ष कहा जाता है।
"जहाँ बीस तीर्थंकरों की आत्माएँ कर्म के बंधनों से मुक्त हुईं, वह भूमि किसी भी श्रद्धालु के लिए केवल यात्रा-स्थल नहीं — वह उसके स्वयं के मोक्ष-मार्ग की अमर याद है।"
शिखरजी की आध्यात्मिक भावनाशिखरजी क्या है — नाम, भूगोल और पहचान
Shikharji शब्द का अर्थ है "सम्मानित शिखर"। इसे सम्मेद शिखर भी कहा जाता है — जिसका भाव है एकाग्रता का शिखर, वह स्थान जहाँ ध्यान की पराकाष्ठा में आत्मा मुक्त होती है। पारसनाथ नाम का उद्भव 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ से हुआ, जिन्होंने 772 ईसा पूर्व इसी पर्वत पर निर्वाण प्राप्त किया।
यह पर्वत झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित है और झारखंड का सर्वोच्च पर्वत है — ऊँचाई 4,480 फीट (1,370 मीटर)। यह दिल्ली-कोलकाता महामार्ग NH-2 पर ग्रांड ट्रंक रोड के निकट है। शिखरजी को जैन धर्म के सात प्रमुख तीर्थों में से एक माना जाता है और यह एकमात्र तीर्थ है जो श्वेतांबर और दिगंबर दोनों संप्रदायों द्वारा सर्वोच्च तीर्थ के रूप में एकमत से स्वीकृत है।
इतिहास — प्राचीन शास्त्रों से आधुनिक काल तक
पुरातात्त्विक संकेत बताते हैं कि इस क्षेत्र में जैन उपस्थिति कम से कम 1500 BCE तक जाती है। इसका सबसे प्रारंभिक साहित्यिक उल्लेख जैन धर्म के बारह मूल ग्रंथों में से एक ज्ञातृधर्मकथा में मिलता है, जो छठी शताब्दी ईसा पूर्व में महावीर के प्रमुख शिष्य द्वारा संकलित किया गया था।
12वीं शताब्दी की पार्श्वनाथचरित और 13वीं शताब्दी की ताड़पत्र पांडुलिपि कल्पसूत्र और कालकाचार्यकथा में भी शिखरजी पर पार्श्वनाथ के निर्वाण का चित्रण मिलता है। वाघेल वंश के राजाओं के प्रधानमंत्री वास्तुपाल ने यहाँ 20 तीर्थंकरों की मूर्तियों वाला भव्य मंदिर निर्मित कराया।
पुरातात्त्विक प्रमाण
इस क्षेत्र में जैन उपस्थिति के सबसे प्राचीन संकेत।
ज्ञातृधर्मकथा में उल्लेख
पहला साहित्यिक संदर्भ — जैन आगम ग्रंथ में शिखरजी का नामकरण।
पार्श्वनाथचरित
भगवान पार्श्व की जीवनी में निर्वाण-भूमि का विस्तृत विवरण।
अकबर का फरमान
मुगल सम्राट ने आधिकारिक आदेश द्वारा शिखरजी की देखरेख जैन समुदाय को सौंपी और पशु-हत्या प्रतिबंधित की।
कुमारपाल लोधा
आगरा के जैन व्यापारी ने यहाँ मंदिर-निर्माण में वित्तीय योगदान दिया।
जगत सेठ परिवार
मुर्शिदाबाद के जगत सेठ कुशलचंद ने 20 मोक्ष-स्थल चिह्नित कराए, जल मंदिर और धर्मशालाएँ बनवाईं।
अनंदजी कल्याणजी ट्रस्ट
सेठ बद्रीदास मुकीम और बहादुर सिंह दुगड़ ने ट्रस्ट के लिए स्थल खरीदा और पुनर्निर्माण कराया।
Save Shikharji आंदोलन
झारखंड सरकार के पर्यटन-टैग के विरुद्ध जैन समाज का राष्ट्रव्यापी संघर्ष और अंततः केंद्र की मान्यता।
परिक्रमा — 27 किलोमीटर की साधना-यात्रा
शिखरजी की तीर्थयात्रा मधुबन से आरंभ होती है — पहाड़ के आधार पर बसी मंदिर-नगरी जहाँ अनेक धर्मशालाएँ, भोजनशालाएँ और मंदिर-समूह हैं। यात्री पहले जल मंदिर और भोमियादेव मंदिर में दर्शन करते हैं, फिर पर्वत-आरोहण आरंभ करते हैं।
मुख्य परिक्रमा 27 किलोमीटर की है — 9 किमी ऊपर, 9 किमी पाँच शिखरों पर, 9 किमी वापसी। मधुबन से शिखरजी और वापसी की पूर्ण परिक्रमा 57 किलोमीटर मानी जाती है। गंधर्व नाला से शिखर तक नंगे पाँव चलना परंपरा है। वृद्ध और दिव्यांग यात्रियों के लिए डोली की व्यवस्था भी उपलब्ध है।
शिखरजी पर भोर में तीन बजे से ही यात्री चढ़ाई आरंभ कर देते हैं। पुजारी, श्रद्धालु, और साधु-साध्वियाँ सब एक साथ उस पर्वत पर चढ़ते हैं जिसे उनके शास्त्रों ने मोक्ष-भूमि कहा है — नंगे पाँव, मन में मंत्र और हृदय में नमन।
Jain Heritage Centres, Sammed Shikharji31 टोंकें — एक-एक मोक्ष की अमर स्मृति
शिखरजी के पर्वत-पथ पर 31 टोंकें स्थित हैं। प्रत्येक टोंक में काले या सफेद संगमरमर में उकेरे चरण-चिह्न हैं — उन तीर्थंकरों के जिन्होंने यहाँ समाधि धारण की। चूँकि इन टोंकों में मूर्तियाँ नहीं हैं, इन्हें श्वेतांबर और दिगंबर दोनों संप्रदाय समान श्रद्धा से पूजते हैं।
सबसे ऊँची और सबसे पवित्र टोंक पार्श्वनाथ टोंक है — सुवर्णभद्र कूट पर। यह एकमात्र टोंक है जिसके चरण-चिह्न पर छत्र बना है जो पार्श्वनाथ को अन्य 23 तीर्थंकरों से विशिष्ट पहचान देता है।
शिखरजी की 31 टोंकें
चरण-चिह्न · मोक्ष-स्थलगौतम गणधर स्वामी
कुंथुनाथ
ऋषभनाथ
चंद्रप्रभा
नमिनाथ
अरनाथ
मल्लिनाथ
श्रेयांसनाथ
पुष्पदंत
पद्मप्रभा
मुनिसुव्रत
चंद्रप्रभा
ऋषभनाथ
अनंतनाथ
शीतलनाथ
संभवनाथ
वासुपूज्य
अभिनंदननाथ
गणधर
जल मंदिर
धर्मनाथ
महावीर
वरिषेण
सुमतिनाथ
शांतिनाथ
महावीर
सुपार्श्वनाथ
विमलनाथ
अजितनाथ
नेमिनाथ
पार्श्वनाथ (सर्वोच्च)
मंदिर-समूह — मधुबन से शिखर तक
वर्तमान मुख्य मंदिर-संरचना 1768 CE में जगत सेठ महताबचंद द्वारा पुनर्निर्मित है, परंतु मूल मूर्ति इससे भी अधिक प्राचीन है — मूर्ति के पादलेख की तिथि 1678 CE है और एक मंदिर-परिसर 14वीं शताब्दी का है।
निचली मंदिर
18वीं शताब्दी में एक कलकत्ता व्यापारी द्वारा निर्मित। तोरणद्वार और दीवारों पर तीर्थंकर-नक्काशी के लिए प्रसिद्ध।
जल मंदिर
जलस्रोत के निकट स्थित यह मंदिर परिक्रमा मार्ग का महत्त्वपूर्ण विराम-स्थल है। टोंक-क्रम में भी सम्मिलित।
भक्तामर मंदिर
आचार्य रामचंद्रसूरि द्वारा स्थापित। भक्तामर स्तोत्र-यंत्र स्थापित करने वाला पहला मंदिर।
नंदीश्वर द्वीप मंदिर
दिगंबर परंपरा का विशाल मंदिर, पहाड़ के आधार पर। नंदीश्वर द्वीप का आभासी चित्रण।
भोमियादेव मंदिर
शिखरजी-प्रवेश के निकट तलेटी पर। यात्री पर्वत-आरोहण से पूर्व यहाँ दर्शन करते हैं।
पार्श्वनाथ टोंक
सुवर्णभद्र कूट पर सर्वोच्च टोंक। छत्र-सहित चरण-चिह्न और अर्घ्य-अर्पण की परंपरा।
भक्ति और साधना — शिखरजी का आध्यात्मिक अर्थ
शिखरजी की यात्रा केवल एक तीर्थ-दर्शन नहीं, एक आध्यात्मिक अनुशासन है। मौन का पालन, नंगे पाँव आरोहण, मितव्ययी आहार और सरल आचरण — ये सब उस जैन भावना को व्यक्त करते हैं जो कहती है कि बाहरी यात्रा भीतरी परिशोधन का साधन बने।
✦ यात्रा के आध्यात्मिक चरण
- मधुबन में प्रवेश — संकल्प और तैयारी
- नंगे पाँव आरोहण — अहंकार का समर्पण
- टोंक-वंदना — तीर्थंकर स्मृति और नमन
- मौन साधना — भीतर की आवाज को सुनना
- पार्श्वनाथ टोंक — मोक्ष-भूमि का स्पर्श
- वापसी — रूपांतरित होकर लौटना
शास्त्रीय और ऐतिहासिक आधार
- ज्ञातृधर्मकथा में पहला उल्लेख (6वीं शताब्दी BCE)
- श्वेतांबर पंच तीर्थ में सम्मिलित
- दिगंबर परंपरा में तीर्थराज की उपाधि
- अकबर के फरमान द्वारा ऐतिहासिक मान्यता (1583)
- कल्पसूत्र पांडुलिपि में चित्रण (13वीं शताब्दी)
- 1918 से अनंदजी कल्याणजी ट्रस्ट द्वारा संरक्षण
⚖️ शिखरजी आंदोलन — पवित्रता की रक्षा का संघर्ष
Save Shikharji आंदोलन जैन समाज का वह महत्त्वपूर्ण अध्याय है जिसमें इस तीर्थ की धार्मिक पवित्रता की रक्षा के लिए लाखों लोग एकत्र हुए। जब झारखंड सरकार ने शिखरजी क्षेत्र में पर्यटन-विकास की योजना बनाई, तो जैन समुदाय ने इसे अपनी आस्था पर आघात माना।
26 अक्टूबर 2018 को झारखंड सरकार ने आधिकारिक आदेश जारी कर शिखरजी को पूजास्थल घोषित किया। दिसंबर 2022 में पुनः पर्यटन-टैग विवाद उठा और देशव्यापी बंद का आह्वान हुआ। एक 72 वर्षीय जैन संत सुग्येयसागर महाराज उपवास पर थे जो जयपुर में दिवंगत हो गए।
जनवरी 2023 में केंद्र सरकार ने पारसनाथ पहाड़ियों पर सभी पर्यटन-विकास गतिविधियाँ रोक दीं — जैन समाज की दशकों की श्रद्धा और संघर्ष की ऐतिहासिक जीत।
शिखरजी कैसे पहुँचें
निकटतम रेलवे स्टेशन पारसनाथ स्टेशन है जो मधुबन से लगभग 25 किलोमीटर दूर है। यह हावड़ा-गया-दिल्ली ग्रांड कॉर्ड लाइन पर स्थित है। हावड़ा राजधानी एक्सप्रेस समेत दिल्ली, मुंबई, जयपुर, कोलकाता की अनेक ट्रेनें यहाँ रुकती हैं।
हवाई मार्ग से — देवघर हवाई अड्डा (107 किमी, 3 घंटे), काज़ी नज़रुल इस्लाम हवाई अड्डा दुर्गापुर (4 घंटे), और बिरसा मुंडा हवाई अड्डा रांची (180 किमी, 4.5 घंटे) — तीनों से टैक्सी/बस सेवा उपलब्ध है।
📿 शिखरजी का सार
सम्मेद शिखरजी केवल एक तीर्थ नहीं — जैन धर्म की जीवंत आत्मा है। यह वह भूमि है जहाँ 20 तीर्थंकरों ने कर्म का बंधन तोड़ा, जहाँ हजारों वर्षों से श्रद्धालु नंगे पाँव पहाड़ चढ़कर मोक्ष की स्मृति को नमन करते हैं, और जहाँ हर टोंक एक ऐसी आत्मा का चरण-चिह्न है जो इस संसार से परे जा चुकी है। जय जिनेन्द्र 🙏

