धरोहर BY JAINKART · Jain Mandir
श्रवणबेलगोला
बाहुबली गोम्मटेश्वर की दिव्य भूमि
कर्नाटक के हासन जिले में विंध्यगिरि पहाड़ी पर खड़ी 57 फुट की एकाश्म ग्रेनाइट प्रतिमा विश्व की सबसे बड़ी मुक्त-खड़ी एकाश्म मूर्ति, जो 1000 वर्षों से अहिंसा, त्याग और मोक्ष की मूक साक्षी है।
श्रवणबेलगोला - यह नाम ही एक अनुभव है। "श्रवण" अर्थात संत, और "बेलगोला" अर्थात श्वेत सरोवर। यह वह भूमि है जहाँ सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने अपना सिंहासन छोड़कर जैन संन्यास लिया, जहाँ ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली की 57 फुट की विशाल प्रतिमा 1000 वर्षों से धूप-वर्षा झेलती हुई मोक्ष-मार्ग दिखाती है। जैन धर्म के 2300 वर्षों का इतिहास यहाँ पत्थरों में जीवित है।
"वह जिसने युद्ध जीतकर भी हथियार नहीं उठाए, जिसने राज्य मिलने पर भी उसे ठुकरा दिया, जो वर्षों तक निश्चल खड़े रहे जब तक लताएँ उनके चरणों से न लिपट गईं वही हैं बाहुबली, जिनकी मूर्ति आज भी विंध्यगिरि पर उतनी ही स्थिर खड़ी है।"
बाहुबली की आध्यात्मिक गाथाश्रवणबेलगोला - नाम, भूगोल और पहचान
श्रवणबेलगोला कर्नाटक के हासन जिले में चन्नारायपटना तालुका में स्थित है। यह बेंगलुरु से 144 किलोमीटर और मैसूर से 83 किलोमीटर दूर है। नगर दो पहाड़ियों के बीच बसा है, विंध्यगिरि (Indragiri) और चंद्रगिरि।
विंध्यगिरि पर गोम्मटेश्वर बाहुबली की विश्वप्रसिद्ध एकाश्म प्रतिमा है, जबकि चंद्रगिरि पर अनेक प्राचीन जैन बसदियाँ (मंदिर) हैं। चंद्रगिरि को सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की साधना-भूमि माना जाता है।
यहाँ श्वेत सरोवर है जिसके नाम पर इस स्थान का नाम पड़ा। नगर में 50 से अधिक जैन मंदिर और बसदियाँ हैं जो 7वीं से 16वीं शताब्दी के मध्य निर्मित हैं।
यह स्थल UNESCO की अस्थायी विश्व धरोहर सूची में है और भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण जैन तीर्थों में से एक है।

बाहुबली की कथा — युद्ध से मोक्ष तक

जैन परंपरा के अनुसार बाहुबली प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र थे। पिता के राज्य विभाजन के बाद उनके बड़े भाई भरत चक्रवर्ती ने उनसे युद्ध की माँग की। दोनों के बीच तीन प्रकार के द्वंद्व युद्ध हुए: जल, दृष्टि और मल्ल।
बाहुबली तीनों में विजयी हुए, परंतु जब उन्होंने भरत को उठाकर जमीन पर पटकने की स्थिति में अपने भाई का चेहरा देखा तो उनका हृदय परिवर्तन हो गया। उन्होंने भरत को छोड़ दिया और समस्त राज्य लौटाकर वन में चले गए।
बाहुबली वर्षों तक कायोत्सर्ग मुद्रा में निश्चल खड़े रहे। उनके पैरों पर लताएँ चढ़ गईं, कंधों पर पक्षियों ने घोंसले बनाए, किंतु वे विचलित न हुए। अंततः उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया।
प्रतिमा में उनके पैरों पर उकेरी गई लताएँ और सर्प इसी साधना-काल की स्मृति हैं। यह मूर्ति त्याग, अहिंसा और मोक्ष का जीवंत प्रतीक है।
बाहुबली ने वह किया जो शायद कोई विजेता नहीं करता जीत के बाद भी सब कुछ छोड़ दिया। उनकी यह मूर्ति इसीलिए केवल पत्थर नहीं, एक दर्शन है। यह कहती है कि सच्ची शक्ति त्याग में है, संग्रह में नहीं।
जैन धर्म का बाहुबली-दर्शनश्रवणबेलगोला का इतिहास
चंद्रगुप्त मौर्य का आगमन
मौर्य सम्राट ने सिंहासन त्यागकर जैन गुरु भद्रबाहु के साथ यहाँ आए और चंद्रगिरि पर सल्लेखना से निर्वाण प्राप्त किया।
जैन केंद्र का उदय
भद्रबाहु के शिष्यों के साथ यह स्थल जैन मठ और आध्यात्मिक शिक्षा का केंद्र बना।
गोम्मटेश्वर प्रतिमा की प्रतिष्ठा
पश्चिमी गंग वंश के सेनापति और प्रधानमंत्री चावुंडराय ने माता की भक्ति में यह एकाश्म प्रतिमा बनवाई।
होयसल राजवंश का संरक्षण
होयसल राजाओं ने अनेक बसदियाँ बनवाईं, जिनमें भांडारी बसदी (1159 CE) प्रमुख है।
महामस्तकाभिषेक की परंपरा
चावुंडराय द्वारा आरंभ यह परंपरा आज भी अनवरत जारी है। 2018 में हुआ, अगला 2030 में।
UNESCO अस्थायी सूची
भारत सरकार ने इसे UNESCO विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में नामांकित किया।
गोम्मटेश्वर प्रतिमा — शिल्प और स्थापत्य का चमत्कार
यह प्रतिमा एकल ग्रेनाइट शिला से उकेरी गई है। इसकी ऊँचाई 57-58.8 फुट (17-17.8 मीटर) है। प्रतिमा कायोत्सर्ग मुद्रा में है दोनों हाथ सीधे नीचे, आँखें अर्ध-खुली, मुख पर अलौकिक शांति। प्रतिमा 25 किलोमीटर दूर से दिखती है।
पैरों के पास उकेरी गई वल्मीक (दीमक की बाँबी), सर्प और लताएँ बाहुबली की दीर्घ साधना का प्रतीक हैं। प्रतिमा के नीचे 981 CE की प्राकृत भाषा की शिलालेख है जो चावुंडराय और उनके गंग राजा राइमल की स्तुति करती है। यह प्रतिमा 2016 तक विश्व की सबसे ऊँची जैन प्रतिमा थी।


श्रवणबेलगोला के प्रमुख स्थल
गोम्मटेश्वर प्रतिमा
विंध्यगिरि पर 57 फुट की एकाश्म ग्रेनाइट प्रतिमा। 981 CE में चावुंडराय द्वारा निर्मित। विश्व की सबसे बड़ी मुक्त-खड़ी एकाश्म मूर्ति।
चंद्रगिरि पहाड़ी
सम्राट चंद्रगुप्त की साधना-भूमि। यहाँ चंद्रगुप्त बसदी और भद्रबाहु गुफा है। अनेक प्राचीन जैन मंदिर।
भांडारी बसदी
होयसल काल में 1159 CE में निर्मित। शिखरयुक्त स्थापत्य और सुंदर जैन मूर्तिकला का उदाहरण।
महामस्तकाभिषेक मंच
हर 12 वर्ष पर प्रतिमा के अभिषेक का भव्य आयोजन। दूध, केसर, घी, गन्ने का रस आदि से अभिषेक।
अक्कन बसदी
प्राचीन जैन मंदिर, विंध्यगिरि के नीचे। नक्काशीदार स्तंभ और शांत वातावरण।
श्वेत सरोवर
नगर के मध्य में स्थित वह सरोवर जिसके नाम पर श्रवणबेलगोला का नाम पड़ा। मनोरम और शांत।
🌿 महामस्तकाभिषेक — विश्व का सबसे भव्य जैन उत्सव
महामस्तकाभिषेक हर 12 वर्ष पर आयोजित होता है। इस अवसर पर गोम्मटेश्वर की प्रतिमा को दूध, दही, घी, केसर, चंदन, गन्ने का रस, हल्दी, कुमकुम, सोने-चाँदी के पुष्प आदि से अभिषेक किया जाता है।
यह परंपरा स्वयं चावुंडराय ने आरंभ की थी। पिछला महामस्तकाभिषेक फरवरी 2018 में हुआ था, जिसमें लाखों श्रद्धालु विश्व भर से आए। अगला महामस्तकाभिषेक 2030 में होगा।
जर्मन इंडोलॉजिस्ट हाइनरिख ज़िमर के अनुसार इन नियमित अभिषेकों के कारण ही प्रतिमा 1000 वर्षों के बाद भी इतनी ताज़ी और उज्ज्वल दिखती है।

विंध्यगिरि और चंद्रगिरि के बीच बसा श्रवणबेलगोला — 2300 वर्षों से जैन धर्म की आस्था का अटल केंद्र।
तीर्थयात्रा और दर्शन
✦ यात्रा के प्रमुख अनुभव
- विंध्यगिरि की 650+ सीढ़ियाँ चढ़कर गोम्मटेश्वर दर्शन
- चंद्रगिरि पर चंद्रगुप्त बसदी और प्राचीन शिलालेख
- भांडारी बसदी की होयसल शैली की नक्काशी
- श्वेत सरोवर परिक्रमा — सूर्योदय-सूर्यास्त पर मनोरम
- स्थानीय जैन संग्रहालय — ऐतिहासिक मूर्तियाँ और शिलालेख
- महामस्तकाभिषेक (2030) — जीवन में एक बार जरूर देखें
श्रवणबेलगोला के प्रमुख तथ्य
- बेंगलुरु से 144 किमी, मैसूर से 83 किमी
- 981 CE में चावुंडराय द्वारा प्रतिमा निर्माण
- 300 BCE में सम्राट चंद्रगुप्त का आगमन
- 57 फुट एकाश्म ग्रेनाइट, 25 किमी से दृश्यमान
- हर 12 वर्ष पर महामस्तकाभिषेक
- अगला अभिषेक 2030 में
कैसे पहुँचें
निकटतम रेलवे स्टेशन हासन (51 किमी) या चन्नारायपटना (11 किमी) है। बेंगलुरु से NH-48 मार्ग से सड़क यात्रा 3 घंटे में होती है। निकटतम हवाई अड्डा केम्पेगौड़ा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, बेंगलुरु (144 किमी) है।
विंध्यगिरि पर चढ़ने के लिए 650 से अधिक सीढ़ियाँ हैं। पहाड़ी के नीचे जूते उतारने होते हैं। सुबह जल्दी जाने पर भीड़ कम होती है और प्रकाश भी सुंदर रहता है।
🌿 श्रवणबेलगोला का सार
श्रवणबेलगोला केवल एक तीर्थ नहीं, यह एक दर्शन है। यहाँ बाहुबली की मूर्ति यह नहीं कहती कि "मैं महान हूँ" — वह कहती है "त्याग ही महानता है।" चंद्रगुप्त जैसे सम्राट से लेकर लाखों साधारण श्रद्धालुओं तक, सबने इस पहाड़ी पर आकर कुछ न कुछ छोड़ा है — अहंकार, भय या संसार की आसक्ति।

