स्थूलिभद्र स्वामी
और कोशा नर्तकी
भोग से वैराग्य तक, एक अद्वितीय आत्मविजय की कथा
जैन इतिहास में कुछ कथाएँ ऐसी हैं जो केवल पढ़ी नहीं जातीं, वे आत्मा में उतर जाती हैं। आचार्य स्थूलिभद्र स्वामी की कथा उन्हीं में से एक है। यह कहानी है एक ऐसे युवक की जिसने बारह वर्ष विलास में गँवाए, और फिर उसी विलास की प्रतीक के सामने खड़े होकर अपनी आत्मा को जीत लिया।
मगध का वह स्वर्णिम युग
लगभग ३०० ईसा पूर्व, मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) में एक शक्तिशाली प्रधानमंत्री रहते थे, शकटाल। वे राजा धनानंद के पिता के समय से राज्य की सेवा करते आ रहे थे, कुशल, बुद्धिमान और सर्वसम्मानित।[१] शकटाल के दो पुत्र थे, जेष्ठ स्थूलिभद्र और कनिष्ठ श्रियाक।
स्थूलिभद्र अत्यंत बुद्धिमान, सुंदर और प्रतिभाशाली थे।[१] पाटलिपुत्र में एक सुप्रसिद्ध नर्तकी थीं, कोशा। बाल्यकाल से ही स्थूलिभद्र उन्हें नृत्य करते देखते थे। धीरे-धीरे वह आकर्षण प्रेम में बदल गया। परिवार के विरोध के बावजूद, मात्र अठारह वर्ष की आयु में स्थूलिभद्र घर छोड़कर कोशा के साथ रहने चले गए।[२]
राजा धनानंद ने स्थूलिभद्र को उच्च राजपद देने की इच्छा व्यक्त की, किंतु स्थूलिभद्र ने मना कर दिया। वह पद उनके छोटे भाई श्रियाक को दे दिया गया।[१]
वह क्षण जिसने सब बदल दिया
बारह वर्ष बीत गए। स्थूलिभद्र कोशा के साथ भोग-विलास में इस तरह डूबे रहे कि परिवार से नाता ही टूट गया।[२] इसी बीच मगध की राजनीति में उथल-पुथल मची। पिता शकटाल ने अपने पुत्र श्रियाक की निष्ठा सिद्ध करने के लिए विष पी लिया और श्रियाक से कहा कि वह उन्हें राजा के समक्ष ही मार डाले, ताकि पुत्र का जीवन सुरक्षित रहे।[१]
बारह लंबे वर्ष मेरी युवावस्था के! इस समय में मैंने क्या पाया? ऐसा क्या अर्जित किया जो शाश्वत हो? क्या मृत्यु से कोई पलायन है?
स्थूलिभद्र स्वामी का आत्म-चिंतन, पिता की मृत्यु के पश्चात् [२]
जब यह समाचार स्थूलिभद्र को मिला, उनकी आँखें खुल गईं। संसार की नश्वरता का बोध हुआ।[२] तीस वर्ष की आयु में स्थूलिभद्र ने कोशा का भवन छोड़ा और आचार्य संभूतिविजयजी, भगवान महावीर के छठे उत्तराधिकारी, के चरणों में पहुँचे और दीक्षा माँगी।[१]
कथा-क्रम: आत्मविजय की पाँच सीढ़ियाँ
कोशा का वह अद्भुत उत्तर
चातुर्मास के बाद जब सभी मुनि आचार्य के पास लौटे, आचार्य ने स्थूलिभद्र की उपलब्धि देखकर उनकी प्रशंसा की।[२] एक अन्य मुनि को ईर्ष्या हुई और उन्होंने अगले वर्षाकाल में वही परीक्षा देने का दंभ किया। आचार्य ने मना किया, किंतु वे नहीं माने।
अगले वर्ष वह मुनि कोशा के भवन पहुँचे। चित्रमहल देखते ही उनकी मनःस्थिति डगमगा गई। कोशा ने, जो अब एक जागृत श्राविका थीं, एक पाठ पढ़ाने की ठानी। उन्होंने कहा: "नेपाल से हीरों-जड़ा वस्त्र लेकर आओ।" वह मुनि चातुर्मास में भी नेपाल की यात्रा पर निकल पड़े।[१]
जो बहुमूल्य वस्त्र आप इतनी कठिनाई से लाए, उसे मैंने पाँव से पोंछकर फेंक दिया। तो आप भी बताइए, जो बहुमूल्य मुनि-जीवन आपने इतने परिश्रम से पाया था, उसे क्यों फेंक रहे हैं?
कोशा का उत्तर उस मुनि को [२]
यह उत्तर जैन साहित्य के सबसे शक्तिशाली वाक्यों में से एक है। उस दिन से संघ में स्थूलिभद्र का सम्मान असाधारण हो गया।[१]
आगम-रक्षक: एक महानायक की विरासत
जैन परंपरा में आचार्य स्थूलिभद्र का स्थान केवल उनकी आत्मविजय के कारण नहीं, बल्कि जैन आगमों के संरक्षण में उनके अतुलनीय योगदान के कारण भी है।[१] उस काल में जैन शास्त्र लिखित नहीं थे, गुरु-शिष्य परंपरा में कंठस्थ किए जाते थे।
बारह वर्ष के भीषण अकाल के कारण अनेक मुनियों की स्मृति से आगम-पाठ विलुप्त हो गए। आचार्य भद्रबाहु अपने शिष्यों के साथ दक्षिण की ओर चले गए।[४] उत्तर में स्थूलिभद्र ने पाटलिपुत्र में वाचना-सभा बुलाई और ११ अंग आगमों को पुनः स्थापित किया।
- पाटलिपुत्र में वाचना-सभा, ११ अंग आगमों का मौखिक पुनःसंकलन[१]
- नेपाल की एकल यात्रा, अनेक मुनि गए किंतु केवल स्थूलिभद्र पहुँचे[१]
- आचार्य भद्रबाहु से बारहवाँ अंग और चौदह पूर्वों का अध्ययन
- सिंह-रूप धारण की भूल के कारण अंतिम चार पूर्वों का अर्थ न सीख पाना[१]
- श्वेतांबर परंपरा में आज भी महावीर स्वामी के पश्चात् स्थूलिभद्र का नाम स्मरण किया जाता है[१]
इस कथा से छह जीवन-दर्शन
जागृति किसी भी उम्र में संभव है
स्थूलिभद्र तीस वर्ष की आयु में संन्यास की ओर मुड़े। जीवन का कोई भी क्षण जागृति के लिए देर नहीं होता।
असली परीक्षा भीतर की होती है
सिंह-गुफा, सर्पकुण्ड ये बाहरी भय हैं। कोशा का चित्रमहल भीतरी वासना की परीक्षा था। वही कठिनतम था।
वैराग्य प्रेम का परिष्कार है
स्थूलिभद्र ने कोशा को घृणा से नहीं छोड़ा। उन्होंने उन्हें मार्गदर्शन दिया और कोशा स्वयं श्राविका बनीं।
ज्ञान का अहंकार आत्मपतन का द्वार है
सिंह-रूप दिखाने की भूल ने अंतिम चार पूर्वों का अर्थ खो दिया। ज्ञान के साथ विनय अनिवार्य है।
संघ-सेवा ही सच्ची साधना है
व्यक्तिगत मोक्ष के साथ-साथ आगम-रक्षण की साधना, यही स्थूलिभद्र को महानायक बनाती है।
अनुभव ही सच्चा गुरु है
बारह वर्षों का भोग-अनुभव व्यर्थ नहीं गया। वह उनकी परिपक्वता का आधार बना।
स्रोत एवं संदर्भ सूची
इस लेख की सभी ऐतिहासिक, आगमिक और कथा-संबंधी जानकारी प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित है।
स्थूलिभद्र की कथा का विस्तृत वर्णन, पाटलिपुत्र, कोशा, आगम-संरक्षण और भद्रबाहु प्रसंग सहित।
कोशा के चित्रमहल का प्रसंग और अन्य मुनि का शिक्षाप्रद प्रकरण।
कोशा का व्रतधारी श्राविका बनना और आचार्य का सम्मान देना।
आगम-वाचना परंपरा का विद्वत्तापूर्ण विश्लेषण।
ब्रह्मचर्य की परीक्षा का तेरापंथी दृष्टिकोण से कथा-वर्णन।
स्थूलिभद्र की दृढ़ता और कोशा के परिवर्तन का शास्त्रीय विवरण।

