धरोहर BY JAINKART · Jain Mandir
लोगस्स स्तोत्र
24 तीर्थंकरों की दिव्य स्तुति
नवस्मरण में तृतीय स्थान पर विराजित यह प्राकृत स्तोत्र जिसे चतुर्विंशतिस्तव या उत्कीर्तन सूत्र भी कहते हैं, ऋषभदेव से महावीर तक 24 तीर्थंकरों की स्तुति करता है और पाठकर्ता को आरोग्य, सम्यक्त्व और मोक्ष की कामना से भर देता है।
लोगस्स यह शब्द प्राकृत भाषा का है जिसका अर्थ है "संसार का" या "जगत का"। लोगस्स स्तोत्र अर्थात् संसार के प्रकाशक तीर्थंकरों की स्तुति। इसे चतुर्विंशतिस्तव (24 तीर्थंकरों की स्तुति) और उत्कीर्तन सूत्र भी कहते हैं। जैन नवस्मरण में यह नमस्कार महामंत्र और उवसग्गहरं के बाद तृतीय स्थान पर है।
"लोगस्स उज्जोअ-गरे, धम्म-तित्थ-यरे जिणे। अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली।"
लोगस्स स्तोत्र — प्रथम गाथा · अखिल जगत में धर्म का प्रकाश करने वाले 24 तीर्थंकरों की स्तुतिस्तोत्र का परिचय — नाम, स्वरूप और महत्त्व
लोगस्स स्तोत्र प्राकृत भाषा में रचित 7 गाथाओं का एक संक्षिप्त किंतु अत्यंत शक्तिशाली स्तवन है। इसमें 24 तीर्थंकरों के नाम, उनके गुण और उनसे माँगी गई तीन सर्वोच्च कामनाएँ — आरोग्य, बोधि-लाभ और उत्तम समाधि — सम्मिलित हैं।
यह स्तोत्र जैन आगम साहित्य में आवश्यक सूत्रों में गिना जाता है। प्रतिक्रमण, सामायिक, देव-वंदन और दैनिक पूजा — सभी में इसका पाठ अनिवार्य माना जाता है। अंतिम दो गाथाएँ सिद्धों की स्तुति में हैं जो 14 सिद्धों के गुणों का वर्णन करती हैं।
सातों गाथाएँ — अर्थ सहित
अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली।।
पउम-प्पहं सुपासं, जिणं च चंद-प्पहं वंदे।।
विमल-मणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि।।
वंदामि रिट्ठ-नेमिं, पासं तह वद्धमाणं च।।
चउ-वीसं पि जिणवरा, तित्थ-यरा मे पसीयंतु।।
आरुग्ग-बोहि-लाभं, समाहि-वर-मुत्तमं दिंतु।।
सागर-वर-गंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु।।
24 तीर्थंकर — एक दृष्टि में
लोगस्स स्तोत्र में गाथा 2, 3 और 4 में सभी 24 तीर्थंकरों के नाम क्रमबद्ध रूप से आते हैं। प्रत्येक तीर्थंकर का एक विशेष लांछन (चिह्न) होता है जिससे उन्हें पहचाना जाता है।
लोगस्स की अंतिम दो गाथाएँ (6 और 7) सिद्धों की स्तुति हैं। इनमें तीन कामनाएँ माँगी जाती हैं — आरोग्य (स्वास्थ्य), बोधि-लाभ (सम्यक्त्व की प्राप्ति) और उत्तम समाधि (मृत्यु के समय शांत चित्त)। जैन दर्शन में ये तीनों एक मोक्ष-यात्री की तीन अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं।
लोगस्स स्तोत्र — गाथा 6 और 7 का आध्यात्मिक महत्त्वतीन दिव्य कामनाएँ — आरोग्य, बोधि, समाधि
आरोग्य
शरीर और मन का स्वास्थ्य। साधना के लिए स्वस्थ काया आवश्यक है — रोगी शरीर में तप और ध्यान कठिन होते हैं।
बोधि-लाभ
सम्यक्त्व की प्राप्ति — सही दर्शन, सही ज्ञान, सही आचरण। जैन मोक्ष-मार्ग का यह मूल आधार है।
उत्तम समाधि
जीवन के अंतिम क्षणों में शांत और जागृत चित्त। समाधि-मरण जैन परंपरा की सर्वोच्च उपलब्धि मानी जाती है।
समाहि-वर-मुत्तमं दिंतु
🌟 लोगस्स — स्तुति की भाषा, मंत्र की शक्ति
लोगस्स स्तोत्र की विशेषता यह है कि यह नाम-स्मरण और गुण-कीर्तन दोनों का संयोग है। 24 तीर्थंकरों के नाम लेते समय उनके विशेष गुणों का स्मरण होता है — यह केवल जाप नहीं, यह आत्म-रूपांतरण की प्रक्रिया है।
अंतिम गाथा में चंद्र और सूर्य से तुलना अत्यंत काव्यात्मक है — सिद्ध भगवान "करोड़ों चंद्रमाओं से अधिक निर्मल" और "सूर्यों से अधिक प्रकाशमान" हैं। यह तुलना बताती है कि सिद्धत्व की शुद्धता और प्रकाश भौतिक जगत के सर्वोत्तम से भी परे है।
लोगस्स का नित्य पाठ करने वाले को 24 तीर्थंकरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है — यह जैन परंपरा की गहरी आस्था है।
पाठ विधि और नवस्मरण में स्थान
✦ पाठ की पारंपरिक विधि
- पहले नमस्कार महामंत्र और उवसग्गहरं का पाठ
- स्वच्छ आसन पर पूर्व दिशा में मुख करके बैठें
- प्रत्येक तीर्थंकर के नाम पर श्रद्धापूर्वक नमन
- गाथा 6-7 में तीन कामनाओं पर मनन करें
- प्रतिक्रमण, सामायिक और देव-वंदन में अनिवार्य
- 1, 3, 7 या 9 बार पाठ शुभ माना जाता है
नवस्मरण क्रम
- १. नमस्कार महामंत्र (नवकार)
- २. उवसग्गहरं स्तोत्र (पार्श्वनाथ स्तुति)
- ३. लोगस्स सूत्र (24 तीर्थंकर स्तुति) ← यह
- ४. सक्कत्थय सूत्र
- ५. से किं तं सूत्र
- ⁝ और आगे के चार स्मरण
✨ लोगस्स का सार
लोगस्स स्तोत्र जैन भक्ति की वह अमूल्य धरोहर है जो केवल सात गाथाओं में 24 तीर्थंकरों के दिव्य गुणों का स्मरण कराती है और हमें याद दिलाती है कि इस संसार में सर्वोच्च प्रकाश, सर्वोच्च निर्मलता और सर्वोच्च गांभीर्य — वह आत्मा में ही है जो राग-द्वेष से मुक्त हो गई हो। जय जिनेंद्र! 🙏
स्रोत एवं संदर्भ सूची
इस लेख की सभी जानकारी प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित हैगाथाओं का विस्तृत अर्थ, तीर्थंकर गुण और नवस्मरण में स्थान।

