फागन फेरी की अद्भुत कहानी
फागन फेरी - अनंत सिद्धों की भूमि श्री शत्रुंजय गिरिराज की छह गाऊं यात्रा
यात्रा का महत्व
श्री शत्रुंजय गिरिराज जिसे अनंत सिद्धों की भूमि कहा जाता है; पर हर वर्ष फागन सुदी तेरस के दिन एक विशेष यात्रा की जाती है, जिसे फागन फेरी कहते हैं। यह छह गाऊं की पावन परिक्रमा लगभग ८४ हज़ार वर्षों से भी अधिक समय से भक्तगण करते आ रहे हैं।
इस यात्रा की पवित्र कथा
एक बार २२वें तीर्थंकर श्री नेमिनाथ भगवान अपने समोसारण में देशना दे रहे थे। उस पवित्र वातावरण में श्री कृष्ण महाराज के पुत्र सांब और प्रद्युम्न के हृदय में वैराग्य के भाव जागे। उन्होंने भगवान नेमिनाथ के पास दीक्षा ग्रहण की और उनकी आज्ञा लेकर शत्रुंजय पर्वत पर उग्र तपस्या एवं ध्यान में लीन हो गए।
फागन सुदी तेरस के उसी पावन दिन, सांब और प्रद्युम्न मुनिराज ने अपने समस्त कर्मों का नाश करके, साढ़े आठ करोड़ मुनियों के साथ भाडवा की डूंगर से सिद्धशिला अर्थात् मोक्ष को प्राप्त किया।
उसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दिन की स्मृति में यह यात्रा की जाती है।
दो सहेलियों की फागन फेरी की भावना
यह पावन कथा सुनकर दो सहेलियों - रीटा और मीता - के मन में भी फागन फेरी करने की उमंग जागी।
मीता: "रीटा, क्या तुम फागन सुदी तेरस की यात्रा के लिए पालीताणा चलोगी?"
रीटा: "घर से पेरेंट्स की परमिशन लेकर मैं तुम्हें बताऊंगी। मासा से फागन फेरी की बात सुनी, तो मन में ये उमंग जागी कि एक बार इस पावन दिन गिरिराज के दर्शन अवश्य करने चाहिए।"
मीता: "ठीक है, मुझे कल तक बताना।"
अगले दिन रीटा खुशखबरी लेकर आई -
रीटा: "मीता! मेरे पेरेंट्स ने परमिशन दे दी है। संघ की ओर से भी यात्रा की पूरी व्यवस्था है, क्यों न हम उसी संघ के साथ चलें?"
मीता: "अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी खबर है! संघ के साथ सब व्यवस्था भी अच्छी रहेगी। चलो, हम भी उसी से जाते हैं।"
रीटा: "हमारे पेरेंट्स भी खुशी-खुशी हमें भेज देंगे।"
गिरिराज का अमिट प्रभाव
यात्रा से लौटने के बाद रीटा और मीता की पालीताणा की बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं। गिरिराज का प्रभाव उन पर ऐसा पड़ा कि उन्होंने दृढ़ निश्चय किया -
"हर वर्ष गिरिराज की यात्रा अवश्य करेंगे।"

