धरोहर BY JAINKART · जैन ज्ञान श्रृंखला
उवसग्गहरं स्तोत्र
उपसर्ग-नाशक जैन स्तवन
2,100 वर्ष पूर्व आचार्य भद्रबाहु स्वामी द्वारा रचित वह दिव्य स्तोत्र जो 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति करता है, समस्त बाधाओं, रोग और संकट का निवारण करता है और आत्मा को सम्यक्त्व की ओर प्रेरित करता है।
उवसग्गहरं स्तोत्र — जैन धर्म का वह दिव्य स्तवन जिसका नाम ही उसका प्रयोजन बताता है। उवसग्ग अर्थात उपसर्ग (बाधाएँ, कष्ट), और हरं अर्थात हरने वाला। यह स्तोत्र नवस्मरण में नमस्कार महामंत्र के बाद द्वितीय स्थान पर है और श्वेतांबर मूर्तिपूजक उपशाखा के सर्वाधिक पठित स्तोत्रों में से एक है।
"उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्म-घण मुक्कं। विसहर विस निन्नासं, मंगल कल्लाण आवासं।"
उवसग्गहरं स्तोत्र — प्रथम गाथा, आचार्य भद्रबाहु स्वामीस्तोत्र का परिचय — नाम, रचयिता और महत्त्व
यह स्तोत्र आचार्य श्री श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी द्वारा रचित है जो 433–357 ईसा पूर्व के मध्य विद्यमान थे — अर्थात भगवान महावीर के मोक्ष (527 BCE) के लगभग 150 वर्ष बाद। वे पाँचवें और अंतिम श्रुतकेवली माने जाते हैं जिन्होंने कल्पसूत्र, दृष्टिवाद और वासुदेवचरित जैसे महत्त्वपूर्ण जैन ग्रंथों की भी रचना की।
यह स्तोत्र 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति में रचा गया है। इसके साथ उनके दिव्य उपासक धरणेंद्र (पार्श्व यक्ष) और पद्मावती माता (यक्षिणी) की शक्ति का भी आह्वान होता है। नवस्मरण में इसे नमस्कार महामंत्र के बाद द्वितीय स्थान प्राप्त है।
उत्पत्ति की कथा — भद्रबाहु और वराहमिहिर
आचार्य भद्रबाहु स्वामी और उनके बड़े भाई वराहमिहिर दोनों वेद और विद्याओं के पारंगत विद्वान थे। श्रुतकेवली यशोभद्रसूरि से दीक्षा लेने के बाद दोनों जैन शास्त्रों में पारंगत हो गए। जब आचार्य यशोभद्रसूरि ने भद्रबाहु को अपना उत्तराधिकारी और आचार्यपद प्रदान किया — वराहमिहिर को यह निर्णय ईर्ष्या और अहंकार से भर गया।
वराहमिहिर ने दीक्षा त्याग दी और ज्योतिषी बन गए। कालांतर में उनकी मृत्यु हुई और वे व्यंतर देव बन गए। पूर्व जन्म की ईर्ष्या के कारण उन्होंने जैन संघ पर उपसर्ग करना आरंभ किया — प्लेग और महामारी फैलाई जिससे अनेक जैन श्रद्धालु काल-कवलित होने लगे।
जैन संघ ने भद्रबाहु स्वामी से विनती की। तब उन्होंने भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति में उवसग्गहरं स्तोत्र की रचना की। इस स्तोत्र की शक्ति से धरणेंद्र प्रकट हुए, वराहमिहिर का व्यंतर-बल क्षीण हो गया और जैन संघ को उपसर्गों से मुक्ति मिली।
जैन परंपरा — भद्रबाहु स्वामी और उवसग्गहरं की रचना-कथाधरणेंद्र और पद्मावती — पार्श्वनाथ के दिव्य रक्षक
जैन परंपरा के अनुसार एक बार एक तपस्वी ने लकड़ी काटते समय एक सर्प-युगल को जला दिया। भगवान पार्श्वनाथ ने उस पीड़ित सर्प-युगल को नवकार मंत्र सुनाया। मृत्यु के बाद वह सर्प धरणेंद्र (नागराज) और सर्पिणी पद्मावती के रूप में उत्पन्न हुए — दोनों भगवान पार्श्वनाथ के परम भक्त।
उवसग्गहरं स्तोत्र का पाठ इन दोनों दिव्य शक्तियों को प्रसन्न करता है। इसीलिए इस स्तोत्र को सर्प-विष नाशक, रोग-निवारक और संकट-हरण करने वाला माना जाता है।
धरणेंद्र
पार्श्वनाथ के यक्ष। नागराज जो भगवान पार्श्व के परम भक्त हैं। उवसग्गहरं पाठ से प्रसन्न होकर भक्तों की रक्षा करते हैं।
पद्मावती माता
पार्श्वनाथ की यक्षिणी। कमल पर विराजित देवी जो श्रद्धालुओं की सभी बाधाएँ दूर करती हैं।
विसहर फुलिंग मंत्र
18 अक्षरों का शक्तिशाली मंत्र — "नमिउण पास विसहर वसह जिण फुलिंग" — जिसका उल्लेख दूसरी गाथा में है।
पाँचों गाथाएँ — अर्थ सहित
मूल स्तोत्र में 7 गाथाएँ थीं। एक गाथा अत्यंत शक्तिशाली होने के कारण और दुरुपयोग की आशंका से हटाई गई। कुछ परंपराओं में दो गाथाएँ हटाई गई मानी जाती हैं। वर्तमान में 5 गाथाओं का पाठ प्रचलित है।
विसहर विस निन्नासं, मंगल कल्लाण आवासं।।
तस्स गह रोग मारी, दुट्ठ जरा जंति उवसामं।।
नरतिरिएसु वि जीवा, पावंति न दुक्ख-दोगच्चं।।
पावंति अविग्घेणं, जीवा अयरामरं ठाणं।।
ता देव दिज्ज बोहिं, भवे भवे पास जिणचंद।।
वसह जिण फुलिंग
ऐतिहासिक क्रम — रचना से आज तक
भगवान महावीर का मोक्ष
24वें तीर्थंकर का निर्वाण — जैन परंपरा का आधार-वर्ष।
भद्रबाहु स्वामी का काल
पाँचवें और अंतिम श्रुतकेवली। कल्पसूत्र और दृष्टिवाद के रचयिता।
उवसग्गहरं की रचना
जैन संघ पर व्यंतर-उपसर्ग के समय — 7 गाथाओं में स्तोत्र की रचना।
एक/दो गाथाओं का लोप
अत्यधिक शक्ति और दुरुपयोग की आशंका से एक (या दो) गाथाएँ हटाई गईं।
कल्पसूत्र पांडुलिपि
ताड़पत्र पांडुलिपियों में स्तोत्र का चित्रण और संदर्भ मिलता है।
नवस्मरण में द्वितीय स्थान
श्वेतांबर मूर्तिपूजक उपशाखा में नमस्कार महामंत्र के बाद सर्वाधिक पठित।
पाठ विधि — कब, कैसे और कितना
✦ पाठ की पारंपरिक विधि
- पद्मासन या सुखासन में पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें
- स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
- पहले नमस्कार महामंत्र का पाठ करें
- श्रद्धापूर्वक और स्पष्ट उच्चारण सहित पाठ करें
- पाठ संख्या — 1, 3, 7, 9, 11 या 27 बार
- पाठ के अंत में धरणेंद्र-पद्मावती का स्मरण करें
पाठ के लाभ — परंपरागत मान्यता
- समस्त उपसर्गों और बाधाओं का निवारण
- रोग, महामारी और ग्रह-दोष की शांति
- सर्प-विष और दुष्ट शक्तियों से रक्षा
- मन की शांति और आत्म-शुद्धि
- सम्यक्त्व की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त
- जन्म-जन्म में बोधि-प्राप्ति का आशीर्वाद
🔱 नवस्मरण में उवसग्गहरं का स्थान
जैन नवस्मरण नौ पवित्र पाठों का संकलन है जो श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा में प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान से पूर्व पढ़े जाते हैं। उवसग्गहरं इनमें नमस्कार महामंत्र के बाद द्वितीय है और वर्तमान काल-चक्र के अंतिम 3,000 वर्षों में प्रथम स्थान पर माना जाता है।
इसकी विशेषता यह है कि यह स्तुति और मंत्र दोनों का संगम है — स्तुति = गुणों की प्रशंसा (स्तव), मंत्र = शब्द-शक्ति (जाप)। इसीलिए इसे स्तोत्र-मंत्र कहा जाता है।
प्रतिक्रमण, पर्युषण पर्व, पार्श्वनाथ जन्म-कल्याणक और दैनिक पूजा — सभी अवसरों पर इस स्तोत्र का पाठ अनिवार्य माना जाता है।
🙏 उवसग्गहरं का सार
उवसग्गहरं स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं — यह जैन भक्ति की आत्मा है। यह बताता है कि पार्श्वनाथ की शरण में आने से न केवल बाहरी संकट दूर होते हैं, बल्कि सम्यक्त्व की प्राप्ति से आत्मा को वह अजर-अमर मोक्ष-पद मिलता है जो चिंतामणि से भी अधिक मूल्यवान है। जय पार्श्वनाथ 🙏
स्रोत एवं संदर्भ सूची
इस लेख की सभी जानकारी प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित हैरचयिता, काल, नवस्मरण में स्थान और सांप्रदायिक विवरण।
भद्रबाहु-वराहमिहिर कथा और स्तोत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।

