जैन धर्म में उपवास आत्मशुद्धि और संयम का साधन है।
एकासन, बियासन, उपवास, आयंबिल और मासखमण इसके
प्रमुख प्रकार हैं। हर उपवास इंद्रिय संयम और तपस्या का अभ्यास कराता है।
इनका उद्देश्य आत्मा को मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करना है।
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21 April, 2026
21 April, 2026
तत्त्वार्थ सूत्र आचार्य उमास्वाति द्वारा रचित जैन धर्म का मूल ग्रंथ है।
इसमें जीवन, कर्म, मोक्ष और धर्म के तत्त्वों का व्यवस्थित वर्णन किया गया है।
सूत्र का सार है, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र ही मोक्षमार्ग हैं।
यह ग्रंथ जैन दर्शन को तर्कसंगत और सार्वभौमिक रूप में प्रस्तुत करता है।
20 April, 2026
प्रेक्षा ध्यान आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा विकसित एक अद्वितीय ध्यान पद्धति है।
इसका उद्देश्य है, आत्मा की शुद्धि, मन की शांति और जीवन में समता का विकास।
यह ध्यान अनुप्रेक्षा (गहन चिंतन) और स्व-पर्यवेक्षण पर आधारित है।
विश्वभर में इसे शांति, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उत्थान के साधन के रूप में अपनाया गया है।
20 April, 2026
जैन धर्म में अष्ट प्रकारी पूजा आठ अर्घ्यों से सम्पन्न होती है,
जल, चंदन, पुष्प, धूप, दीपक, नैवेद्य, फल और आरती।
हर अर्घ्य आत्मशुद्धि, संयम और भक्ति का प्रतीक है।
पूजा का उद्देश्य बाहरी अर्पणों के माध्यम से आंतरिक साधना को जागृत करना है।
20 April, 2026
उत्तराध्ययन सूत्र भगवान महावीर की अंतिम वाणी का संकलन है।
इसमें पाँच प्रमुख जीवन-दर्शन बताए गए हैं, सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, संयम और क्षमा।
ये उपदेश आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग की ओर मार्गदर्शन करते हैं।
सूत्र का संदेश है कि धर्म का सार विनम्रता, करुणा और आत्मिक उत्थान में निहित है।
20 April, 2026
आयंबिल उपवास जैन धर्म की एक विशेष तपस्या है।
इसमें एक दिन केवल एक बार *रसायन-रहित*
(बिना नमक, तेल, मसाले, घी, दूध, दही आदि) भोजन लिया जाता है।
भोजन साधारण उबला हुआ होता है, जैसे दलिया, खिचड़ी या उबली हुई दाल।
15 April, 2026
जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों की दिव्य महिमा का वर्णन किया गया है।
प्रत्येक तीर्थंकर ने मोक्षमार्ग का उपदेश देकर जीवों को सत्य और अहिंसा की ओर प्रेरित किया।
उनकी जीवनकथाएँ त्याग, तपस्या और करुणा का आदर्श प्रस्तुत करती हैं।
24 तीर्थंकरों की स्तुति आत्मिक शुद्धि और मोक्ष की साधना का मार्ग प्रशस्त करती है।
15 April, 2026
पर्युषण पर्व जैन धर्म का सर्वोच्च और पवित्र उत्सव है।
यह आत्मशुद्धि, तपस्या और क्षमा का महापर्व माना जाता है।
श्रद्धालु इस दौरान उपवास, स्वाध्याय और सामायिक का पालन करते हैं।
पर्युषण का मुख्य संदेश है क्षमा, करुणा और आत्मिक उत्थान।
15 April, 2026
जैन धर्म में पाँच संकल्पों को जीवन का आधार माना गया है।
गृहस्थों के लिए अणुव्रत छोटे रूप में पालन किए जाते हैं।
साधुओं के लिए महाव्रत पूर्ण और कठोर रूप में निभाए जाते हैं।
दोनों ही मार्ग अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पर आधारित हैं।
14 April, 2026
जैन ब्रह्मांड विज्ञान ब्रह्मांड को अनादि-अनंत मानता है।
यह दो भागों में विभाजित है, लोक और अलोक। लोक में ऊर्ध्वलोक,
मध्यलोक और अधोलोक तीन जगत आते हैं। अलोक शून्य और
अनंत विस्तार वाला क्षेत्र है, जहाँ कोई जीव या पदार्थ नहीं होता।

