भक्ति रस की एक अमर काव्य रचना रत्नाकर पच्चीसी। आचार्य श्री
रत्नाकर सूरीश्वर जी ने अन्तर्हृदय से आदीश्वर भगवान के समक्ष अपने
मन के दोषों की आलोचना करते हुए इस काव्य की रचना की। इस चित्र
संपुट में रत्नाकर पच्चीसी के प्रत्येक श्लोक का दर्शनीय रंगीन, भावपूर्ण
चित्र दिया गया है तथा हिन्दी पद्यानुवाद व गुजराती एवं अंग्रेजी अनुवाद
भी साथ में दिया गया है। यह कृति नित्य पठन करने वाले श्रावकों के
लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।